पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा समय ४ ] पृथ्वीराजरासो। २७६ हजार पंच सेना सन्नथ, करि जुहार अर चह्वयो। लबहल्हि गसंत सायरत दिन, ढाक सेर गिर छह्वयो ॥ छं० ॥ २० ॥. छ० ॥ १३ ॥ ओड़छा पर चढ़ाई की शोभा का वर्णन ॥ छंद गीता मालती ॥ सजि चल्यो तामं जुद्ध धालं केन कामं पूरयं । घन घोर घटा समुद फहा दूम उलहा सूरयं ॥ २१ ॥ धुंधरिग सानं फुरेसानं देस जानं चल्लयं । दानवज्ज थानं परि भगानं सूरतानं सल्लयं ॥ २२ ॥ आजानुबाहं पहे थाहं गज्ज गाहं घुम्मरे । चह चहे महं गज्ज सहं घटा भहं उप्परे ॥ २३ ॥ नारद वदक्कं सूर ढक्कं लेयन्न श्छंकं जुद्धरे । जड़क्का उप्परि कंठला करि शराभष्फुरि अष्फुरे ॥ छं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ १४ ॥ ओड़छा के राजा जसंवन्त का सामना करने के लिये प्रस्तुत होना ॥ दूहा ॥ सुनी धाइ जसंवंत नृप, आयो सेन सुसज्जि । ढलकि ढाल बहल मिलिय, पुब्ब झाडाउ अवज्जि ॥ छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ १५ ॥ लड़ाई होना और लोहाना का जीतना ॥ छंद विराज ॥ बजे सिंधु नहं । करी सुन्कि महं ॥ हकं सूर बज्जे । मनो मेघ गज्जे ॥ २६ ॥ फुटे अग्ग बाजी । असे सार आजी ॥ मचे गोम थोमं । मनो राहु सोमं ॥ २७ ॥ भिड़े चत्थ बत्थं । मनो जुद्ध पत्थं ॥ घरे धीर धारी । बकै मार मारी ॥ २८ ॥ १३ पाठान्तर-उंडछा । थांन । कछ । इहां पंगा । सजि गसत ॥ १४ पाठान्तर-पुरेलानं । सलयं पुम्मरे । छू । लेयन । उंडंछा । कंवला ॥ १५ पाठान्तर-नृप । पुब' । झझाउ ॥