पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
DevanagariHindipublished470 पृष्ठ
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२८० पृथ्वीराजरासो । [ चौथा समय ४ ग्रहे सीस ईसं । करा रंत दीसं ॥ जुत्तं मरहं । मचे एम कहं ॥ २९ ॥ खरै यों लुहानं । अभंगं जुवानं ॥ जसक्वंत जोरं । चहक्कंकेति घोरं ॥ ३० ॥ गसेते गसानं । गए अग्ग थानं ॥ छं० ॥ ३१ रू० ॥ १६ ॥ दूहा ॥ खेचर भूचर जलचरह, सूर गए सुर थान । जुद्ध जुरे जसवंतसी, रन जित्यो लोहान ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ १७ ॥ लोहाना का गढ़ पर अधिकार कर लेना ॥ कवित्त ॥ सहस उभय लोहान, सुभट परि खेतह मज्जे । खार धार परछार, उभय गजराज विभज्जे ॥* सय सत्तह हय खेत, नेत बद्धे रिन जित्यौ । षट सहस (अर)† पवंग, कवी चंदह कवि कित्यौ ॥ परि लुब्ध कोस सुर दून प्रति, धर लिन्मी गढ़ संजियौ । करि जेव बयठो गढ़ परि, इक्क यानि मन रंजियौ ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ १८ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके लोहाना आज्ञा- नबाहु समय नाम चतुर्थ प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ४ ॥
· १६ पाठान्तर-भनां । अगि । मनां । हयं । मनो । राम । मचैं । लरैं । यौं ॥ १७ पाठान्तर-थलचरह । सुर । जसवंतसा ॥ १८ पाठान्तर-लुहान मजे । * यह पाद संवत् १८४९ की लिखित पुस्तक में नहीं है ॥ † यह अधिक पाठ है । कित्तौ । लिंची । भंजियो । बयठो । रंजियो । लोहान ॥