भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 470 में से

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पृष्ठ 292

अथ कन्हपट्टी* समय लिख्यते ॥ ( पांचवां समय ) पृथ्वीराज को सोरा भीमंग से बैर होने का कारण ॥ दूहा† ॥ सुती कहै सुक संभरी, कहै कथा प्रति प्रान ।‡ पृथु सोरा भीमंग पहु, किम छुत्र बैर विनान ॥ छं० १ ॥ रू० ॥ १ ॥ १ पाठान्तर-शुकी । शुक । कहैं । संभरी । कह्यो । पांन । पान । प्रभु प्रियु । बीर ॥ * कन्ह पृथ्वीराजजी का चाचा अर्थात् काका था । वह सदा आँखों के पट्टी क्यों बांधे रहता, वा इसका वर्णन इसमें होने से इसका "कन्हपट्टी समय" नाम हुआ है । इस समय में गुजरात के दूसरे चालुक्य राजा भोला भीम का नाम और उससे पृथ्वीराज के बैर होने की कथा प्रथम ही आई है । और इसमें कहीं भी यह नहीं कहा हुआ है कि सोमेश्वरजी को भीम ने मार डाला था और उसका बैर लेने को पृथ्वीराजजी ने उस पर चढ़ाई करके उसे मार डाला था । जिन लोगों के हृदय में यह रासो कांटा सा खलता है उनके ही मानने के अनुसार भीम देव दूसरा सं० १२३५, ई० ११७८ में गद्दी पर बैठा था और ६३ वर्ष राज्य करके सं० १२९८, ई० १२४१ में परलोक को सिधारा । और पृथ्वीराजजी का जन्म सं० १२०६ में होकर वे ४३ वर्ष की वय में सं० १२४९ में मरे । इस से सिद्ध है कि सं० १२४९ तक तो दोनों राजा निर्विवाद सम- कालीन रहे । अब रहा उनके मारे जाने का हाल सो यहां है नहीं। जहां वह आवेगा वहां हम उसके विषय में भी ऐसी ही सत्यविवेचना करेंगे । अतएव यह समय तो क्षेपक सिद्ध नहीं होता ॥ † एक पाठक की शंका है "क्या दूहा और दोहा की मात्रा में कुछ भेद है"? उत्तर- कुछ भेद नहीं है। दूहा पुराना और दोहा नया प्रयोग है। उनमें से दूहा "दु + ऊह" से बना है अर्थात् जिसमें दो ऊह हों उसे दूहा कहते हैं। और हिन्दी दोहा शब्द संस्कृत द्वोहा से इस प्रकार बना हुआ जान लेना चाहिए-द् + अ + उ = द् + अ + व् = द्व । दु + ऊहा = दु + अ + ऊहा = दु + ओ + हा = द्वोहा = हिंदी दोहा । पट्टभाषा के प्रचार के समय में इसको द्वोहड़िका वा दोहड़िका भी कहते थे । उसका संस्कृत में लक्षण और उदाहरण यह है- मात्रा त्रयोदशकं यदि पूर्वं लघुक विराम । पश्चाद्द्वादशकंतु दोहड़िका द्विगुणेन ॥ तथा उसका प्राकृत उदाहरण यह है :- माई दोहडिपठण सुण हसिओ काय गोवाल । वृन्दाबणघणकुंज चलिओ कमल रसाल ॥ अस्यार्थः- हे मात:! दोहड़िकापाठं श्रुत्वा कृष्ण गोपालो हसित्वा कमपि रसालं चलितः कुत्र वृन्दावन- घनकुंजे वृन्दाबनस्य निविड़निकुंजे । राई दूति क्वचित् पाठः तन्मतेन राधिकाया दोहड़िका पाठं श्रुत्वा । गुरुंलघु व्यत्ययेन् बहुधा भवति ॥ यह २४ मात्रां का छंद है । उसमें यति १३ । ११, १३ । ११ पर हैं । और उसमें ६ ताल होते हैं-४ ४' २ १२", ४ ४'-, ऐसा दोहा गाने में ठीक दीपता है ॥