भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

२८२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय २ पृथ्वीराज के कुंअरपन का तपतेज वर्णन ॥ कबित्त ॥ कुँअरप्पन प्रथिराज । तपै तेजह सु मछावर ॥ सुकल बीजु दिन द्युतें । कला दिन चढ़त कलाधर ॥ मकर आदि संक्रमन । किरन बाढै किरनाकर ॥ त्यौं सोमेस कुँआर । जोति छिन छिन अति आगर ॥ च्य उत्थिय देत संकै न मन । पख पंडन गढ़ गिरन बर ॥ चिँहु जोर जोर दसहूँ दिसा । कीरति विस्तार सचिय पर ॥ छं० ॥ २ ॥ रु०२ ॥ गुजरात के राजा भोरा भीम का तपतेज वर्णन ॥ कबित्त ॥ भोरा भीम भुजंग । तपैग़ुज्जर घर आगर ॥ है गै दल पायक़* । पग्गबल तेजह सागर ॥ काका सारँगदेव । देख जिम तास बड़ाइय । तासु पुत्र परताप । सिंघ सम रूप सु भाइय ॥ परतापसीह अरसीह बर । गोकुलदास गोविंद रज । सूरसिंघ स्याम भगवान भर। कुल अरेह सुभ नीर सज ॥ छं० ३ ॥ रु० ॥ ३ ॥ उसके काका और चचेरे भाईयों की वीरता का वर्णन ॥ दूहा ॥ जोरावर जुरि जंगमति, भरे बध्य नभ गाज । हुकम स्वामि छुटत सु इम, मनौं तितर पर बाजं ॥ छं० ॥ ४ रु० ॥ ४ ॥ तिन पर तुट्टै बीज जौं, जिन पर राज अरुट्ट । राजकाज संमुख भिरन, दई न कबहूँ पुट्ठ ॥ छं ॥ ५ ॥ रुं० ॥ ५ ॥ ‡ यहां शुक और शुकी से कवि का अभिप्राय चंद और उसकी स्त्री से है । क्योकि यह सब महाकाव्य उनके ही संवाद में रचा गया है और आगे भी कई एक समयों में यही प्रयोग आवेगा । चंद प्रायः कवि को कीर की उपमा देता है- "आस असन कवि कीर" ॥ २ पाठान्तर-कुचरपन । कुंअरप्पन । पृथीराज । * ज्यों ज्यौ अधिक पाठ है । जिम । बढै । कुवार । कुंमार । छिन ही छिन । हथि । गिनर । चिंहु । चिहुं । दिशा विसतरि ॥ ३ पाठान्तर-गुज़र । हय । गय । पाइक । * प्रचंड अधिक पाठ । पायक । सु । सारंग- देव । बडाई । तास । भाई । सिंह । सिंघ । श्याम । भगवान । सजि ॥ ४ पाठान्तर-जग । बध । गाजि । स्वांमि । छुटतं । मनो । तीतर ॥ ५ पाठान्तर-ज्यों । असंठं । पिट्ठं ॥