पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवां समय ४ ] पृथ्वीराजरासो । २८५ अरसीह पुट्ठ जग धत्थौ देष । सनमुष्य क्रम्यौ सम सीह भेष ॥ गज गही दौरि सिर पग्घ सुंड । दिय गुरज चीर दय हत्थि मुंड ॥ छं० ॥ २५ ॥ फय्यौति सीस भइ पंच फारि । गज ढल्यौ जानि गिरवर विसार ॥ सुनि बत्त राज भोग सु भीम । पायौ अनंत दुप आप होम ॥ छं० ॥ २६ ॥ कह वाव कियौ नृप अप्प साम । तुम सो न हमहि चाकरह काम ॥ छं० २७॥रु०॥१३॥ उन सातों भाइयों का चलचित्त होना ॥ दूहा ॥ भा उभय अहंकार करि, हन्यौ सुवर गजराज । दोस हमहि लग्यौ नहीं, आप हि कीन अकाज ॥ छं० ॥ २८ ॥ रु० ॥ १४ ॥ पृथ्वीराज का उन चलचित्त सातों भाइयों को जागीर और सिरोपाव देना ॥ दूहा ॥ सात भ्रात निज वात सुनि, भए अप्प चलचित्त । प्रथीराज सुनि कुँअर नें, आप बुलाये चित्त ॥ छं० ॥ २९ ॥ दिये हत्थ लिखि गाम पट, रहे बांस थिर आनि । चालुक चतुर वीर वरं, जिन उंपत सुष पानि ॥ छं० ॥ ३० ॥ बाजी सत दीने वगसि, संबोघे सत भ्रात । एक एक सिर पाव दिय, बहु आदर किय वात ॥ छं० ॥ ३१ ॥ गुरु लज्जा गुरु मत्ति गुरु, पन गुरु साष नरेस । गुरु डर सत गुरु सूरतन, गुरु गति मति गुरु भेस ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १५ ॥ पृथ्वीराज का दर्बार करके बैठना-उसमें प्रतापसी का आना और उसे मूंछ मरोड़ने पर कन्ह का मारना ॥ सोरठी दूहा ॥ सम इक सोम कुमार, सम सामंतन सूर सम । सोम सीस भुअ भार, सो बैठे सुभ सभा रचि ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १६ ॥ २५ ॥ सुसीस । भय । फ़ार । गै । जांनि । बिसाल । बत । हाँम ॥ २६ ॥ कहवाय । कीयौ । अय । शाम । साम । सौं । सौं । न काँम ॥ २७ ॥ १४ पाठान्तर-भ्रात । अहंकारी ॥ यह सं० १६४० की पुस्तक में नहीं है । और भा शब्द भ्रातं का वाचक है ॥ १५ पाठान्तर-निजि । भये । अय । अचल । चित्त । कुंअर । बुलाएं । हित ॥ २९ ॥ हथ । गांव । श्रोयत ॥ ३० ॥ बाज । संपत्त । दिने । शिरपाव ॥ ३१ ॥ गुर । नरेश । गुर ॥ ३२ ॥ १६ पाठान्तर-सोरठा । समै । समै । एक । कुंआर । सामंतरह । शीश । भू । बैठें ॥