भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 297

२८६ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय ५ छंद मोतीदाम ॥ रची सुभ खांम सभा पृथिराज । विराजित मेर जिसे सर साज ॥ भुजा लम कन्ह रजे चहुवान । तिनै मुछ राजत है मुच पान ॥ छं० ॥ ३४ ॥ जिनै चष चाचि कंपै अर सांन । कंपै जनु जोरन अप्प सिवांम ॥ रहै चष वारि सुरातन एम । जवा अन प्रात किये सब जेम ॥ छं० ॥ ३५ ॥ तहां वर चांवँड राउ रजंत । जुधं मधि चांवँड रूप सजंत ॥ नृसिंह विराजत सिंघ जिसैय । विभीषन भा कयमास जिसैय ॥ छं० ३६ ॥ सबै अर जोर उतथ्य सुखंत । तिनं मधि पीथ कुँआर रजंत ॥ मनौ सुकलं पष बीज कौ चंद । निया रख राजत तारन वृंद ॥ छं० ॥ ३७ ॥ प्रतापसि सातउ भ्रात सरीस । पृथी पति आइ नमाइय सीस । ति षोचत मानुस तं सत सेर । किधौं सत सिंधु सुहंत उजेर ॥ छं० ॥ ३८ ॥ सनंमुष कन्ह प्रतापसि आइ । ठई तिन बैठन साच सुभाइ ॥ कहै अर सारथ वत्त स वांन । धल्यौ परतापसि सुच्छन पांन ॥ छं० ॥ ३९ ॥ लषी चहु आंन सु कान्ह अपंन । काढी असि तब्ब असंख अपंन ॥ दई असि दौरि जनेउ उतारि । दूछी धर अङ्क उपंस विचारि ॥ छं० ॥ ४० ॥ मनो सब नागर सावु कटंत । दूछी जनु गंठि बिचें विच तंत ॥ पर्यौ परताप पृथी पर आप । भई अर मध्य सुजोर अमाप ॥ छं० ॥ ४१ ॥ छ० ॥ १७ ॥ भाई के मारे जाने पर अरिसिंह का क्रोध करना और कन्ह चौहान पर वार करना ॥ दूहा ॥ भई दूह मक्करूच मचल, पर्यौ भुंमि परताप । ढाल बीर बब्जे विषम, अरसी कुप्यो आप ॥ छं० ॥ ४२ ॥ दू० ॥ १८ ॥ १७ पाठान्तर—पृथीराज । मेर । कन्हं । रचे । चहुवानं । तिनं । मुछ पांन ॥ ३४ ॥ जिनं । कंपै । चंपै । अप्पन मोर । रहे । कि उसकन्नेम ॥ ३५ ॥ चामुंड । चाबंड । राय । चामुंड । नरसिंघ । विराजित । जिसो । सिसु । भीषन । जिसी ॥ ३६ ॥ सबै । घोरं । ऊतथ । पिय । कुमार । कुंआर । मंनों ॥ ३७ ॥ पृथीपति । नमाईय । शीका । सोहति । मानौं । मांनुस । किधों ॥ ३८ ॥ प्रतापसी । आय । कहैं ॥ बस । मुझन । मुंछन ॥ ३९ ॥ चहुवांन । अपान । तारि । बही ॥ ४० ॥ मनौं । नागर । बिचे । पृथी ॥४१॥ १८ पाठान्तर—दोहा । भइ । भुमि । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥