पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । २८७ कवित्त ॥ भई कूह परताप । पन्यौ दिष्यौ अरसी वर । उथ्यौ कह्नि तरवारि । दई भुज कन्ह बाम कर ॥ इक्क सीच वर ओर । गरै पप्पर गचि डारी । एक अगनिता मद्दि । आनि कूंषी घृत धारी ॥ चहुआन कन्ह अग्गै सुवर । ता पच्छै लोचनदग्यौ । जाजुलित सत्त वर वीर मंत । वीर वीर रस सौं छग्यौ ॥ छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥ पृथ्वीराज का महल में जाना और अरिसिंहादि की लड़ाई का होना ॥ दूहा ॥ उठि कुंवर प्रथिराज लषि, गयौ मचल्ल निज मद्दि । दै किवाट मिलि थाट जुध, मच्यौ कलच सभ मद्दि ॥ छं०४४॥रु०॥२० ॥ गाहा ॥ कढ्ढी असि अरसिंघं । नरसिंघस्य झारयं सीसं । दई गुरज गुर अंडुं । वड गुज्जरं रंभ कंदाइं ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ २१ ॥ चालि ॥ दिषि चावंडं ॥ षिजि चावंडं ॥ लोच चावंडं ॥ मन चावंडं ॥ चावंडं ॥ छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ २२ ॥ कवित्त ॥ वढिय जंग उत्तंग । दंग जनु दाव जुजग्गिय ॥ परिय रौर राव रन । जुरिय जुध कन्ह अभिग्गिय ॥ मारि ढारि अरिसीच । चक्यो गोयंद मेच गृत्ति ॥ कढ्ढि छद्ध्य जम दद्व । दई चहुआन कूप घत ॥ करि रोस कन्ह कर चंपि सिर । दो छद्ध्यन भेजी उठिय ॥ निकसीय प्रांन गोविंद उर । जोति भेदि जोतिह मिलिय ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २३ ॥ १६ पाठान्तर-वांम । एक । और । ढारीय । आंनि । चहुआन । अगें । पक्कै । मत्त । सो । २० पाठान्तर-उठि । लिपि । मधि । सम । संधि ॥ २१ पाठान्तर-गाथा । वरसिंघं । शीसं । बडगुजरं । कंदाई ॥ २२ पाठान्तर-वचनीका । छंद । चामुंडं । पिंजे चांमुडं । चामुंडं ॥ २३ पाठान्तर-उतंग । यु । लगिय । परीय । रौरि । अभिगिय । अचागीय । हृद्य । दढ । कुषि । घति । हद्यन । निहस्सि ॥ ५