पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ पृथ्वीराजरासो । [ पांचवां समय १२ ,
दूहा ॥ पच भरैं जुग्गिनि रुधिर । ग्रिधियं मंस डकारि ॥ नचौ ईस उमया सहित । रुंड माल गल धारि ॥ कूं० ॥ ६६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ कंद पद्धरी ॥ दरवार ताल रुधि भरित वारि । द्रुक हथ्थ·रत चढ़ी किनारि ॥ तिन मधि मग्न तरु जिम मजंत । धर धारि मारि जे धुकत मंत ॥ ॥ कूं० ॥ ६७ ॥ रु० ॥ ४० ॥ दूहा ॥ * खेल मच्यौ दरबार सन्नि । मत्त गवार बसंत ॥ सिर भ्रुक बिनु धावइ करै । सुभट सुअंगध कंत ॥ ॥ कूं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४१ ॥ कंद लघुनाराच ॥ धुंकंत धार धार सैं । बकंत मार मार सैं ॥ झुकंत झार झार सैं । तकंत सार तार सैं ॥ ६९ ॥ डकंत भूत डाक सैं । कसंत बीर बाक सैं ॥ परंत छीन पाइट्टै । झरंत हथ्य घाइट्टै ॥ ७० ॥ खरंत संत मंत सैं । घुरंत घाइ घंत सैं ॥ सुभग्ग अंगुली थिरैं । फबी सुकैर विध्युरैं ॥ ७१ ॥ नचंत घाइ नारदं । ठरै सुधाइ ठारदं ॥ अभक्कि रुद्धि अम्भसे । बबक्कि रह बह से ॥ ७२ ॥ चबक्कि ढाक चक्कए । चवक्कि कुंभ चक्कए ॥ म्रोरित्त मुच्छ मुच्छए । चढ़ी सु आनि चच्छए ॥ ७३ ॥ चलंत हाथ चंचलं । परंत बांन पंचलं ॥ भिदंत भांन मंडलं । भयौ सु नष्ट कुंडलैं ॥ ७४ ॥ बहंत मोष बहए । छराकि लग्गि छहए ॥ कटंत सीस कहए । रिनंक षत्त फहए ॥ ७५ ॥ फटंत फंफ फेफरं । गटंत पेषि केफरं ॥ बजंत घाव घुंमरे । मनौं परेव घुंमरे ॥ ७६ ॥
३९ पाठान्तर-ग्रिधय । ग्रिधिय ॥ ४० पाठान्तर-हथ्थ । रत । चढ़ी । मधि । ते ॥ ४१ पाठान्तर-मत्त । गवांर । बन्नु । धावहं ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥