भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 470 में से

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पृष्ठ 301

२६० पृथ्‍वीराजरासो । [पांचवां समय १० चालुकों के मारे जाने से दरबार में कोलाहल होना ॥ दूहा ॥ कोलाहल दरबार भौ । सुनि चालुक मत सध्य ॥ धसिय पौरि गज मत्त सम । पुच्छत पुच्छत कथ्य ॥ छंदं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३० ॥ झिंक रुधिर उठ्ठत गिरिय । परिय सच परिधारि ॥ दिषि चालुक भत तेह टग । कुलच्च बाजि जनु डारि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ कवित्त ॥ संकर सिंघ कि कुट्टि । कुट्टि इन्द्रच्च कि गरुअ गज ॥ कि महिष कुट्टि मय मत्त । भरिय दीयौ कि दुट्ठ कजि ॥ भौ कि हांस रस रोस । मद्धि रावन्त विरच्चिय ॥ कोलाहल बल कूक । मज्झ रावर छल मचिय ॥ चालुक्क षवास ताकथ्य कथि । कोलाहल इन जानि घर ॥ कुंडिय सयल बोच्चिय नृपति । हनिग कन्ह सारंगधर ॥ छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ दूहा ॥ अर प्रताप दरबार के । ढार घरे मय मत्त ॥ सुनत बत्त इह कन्हि परे । मनु निस तुहि नछत्त ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ कवित्त ॥ निसि षह तुहि नछिच । रोस महिषा कुटि वातन ॥ परि कि दीप पातंग । सिंघ जनु कुट्टि क्षुधा तन ॥ यों तुहैं भर भरन । अररि भैभीर सुभग्गिय ॥ मनहुँ परा पति चुनत । परिय सिंचान अचिंतिय ॥ परि रौर पौरि दीनी दरकि । धरकि कूच कन्ह पौरि बिचि ॥ झेलत सब संत कलहंत जनु । पारथ सम भारत्थ मचि ॥ छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३४ ॥ दूहा ॥ माया मोह विरत्त मन । तन तिनुका सम डारि ॥ ३० पाठान्तर-सथ । मत । पुछत । कथ ॥ ३१ पाठान्तर-बाजं । यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ३२ पाठान्तर-भरीय । दीपि । मधि । रावत । विराचिय । मन्न । मचिय । कथ । जांन ॥ ३३ पाठान्तर-मत । बत । मनौं । नछिच ॥ ३४ पाठान्तर-नक्छित्र । परियं । संघ । मनौं । मनहुं । अचितीय । दीनीय । बच । पेलंत । स । भारंथ ॥ ३५ पाठान्तर-विरतं । पिय ॥ यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 301, कुल 470 में से · BharatKosha