पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवां समय १५ ] . पृथ्वीराजरासो : २६५ सात दिन तक कान्हके न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥ कवित्त ॥ सात दिवस जब गए । कन्ह दरबार न आए ॥ तब प्रथिराज कुँआर । अप्प मनए गृह जाण ॥ तुम ऐसी क्यौं करौ । अप्प सिर चढिय सुकाई ॥ कहिहैं सब चहुआन । छने चालुक्क सुराई ॥ आणि विषैं अप्पन सुघर । सो रावर ऐसी करिय ॥ इक दोस अप्प लग्ग्यौ खरौ । बत्त वित्तरीय जग बुरिय ॥ ॥ छं० ॥ ८० ॥ रु० ॥ ५२ ॥ कान्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर मोछ पर ताव रख सकता है ॥ दूहा ॥ कही कन्ह चहुआन तब । सो बैठें कोइ आनि ॥ सभा मद्धि संभरि अवर । मुच्छ धरै क्यौं पानि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु० ॥ ५३ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी बांधे रहा कीजिए ॥ करी अरज प्रथिराज वर । जो मानौ इक कन्ह ॥ सभा बुराई जौ मिटै । चष बँधि पह रतन ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु० ॥ ५४ ॥* पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कान्ह के आंख में बांध देना । तब प्रथिराज विचार करि । चष आछौ हो पह ॥ बहुरि कोइ भर भोरछी । धरत परै इक बह ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रु० ५५ ॥ ५२ पाठान्तर-कुंआर । अप । शिर । काइय । कहिहैं । चालुक । राइय । विषै । करौय । लग्यौ । विस्तारिय ॥ ५३ पाठान्तर-कोई । आंनि । मधि । संभरी । मुछ । पांनि ॥ ५४ पाठान्तर-पृथ्वीराज । जौँ । माँनौँ । जौँ । बधि । * संवत् १६४० की प्रति में यह नहीं है ॥ ५५ पाठान्तर-पृथ्वीराज । घंट । बट ॥ ६ !