भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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छठां समय ३] पृथ्वीराजरासो । ३०१ पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना । कवित्त ॥ कर पद मत्त धनुष्ष । ढाल आनन सुचक्क रथ ॥ पटह छींस घन सह । विपुछ बद्धीय समग पथ ॥ इक बंधिय इक बधिय । एक भंभिय भ्रम भीर ॥ इक्क सु मृग विफुरीय । इक्क चिकरीय दीन सुर ॥ कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन । दिग्घ सह दिग अंत भौ ॥ संकिय सयल्ल जिम रंक उर । द्रुम अरन्य आतंक भौ ॥ छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ ५ ॥ अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना । कवित्त ॥ जंगल धर सुकुमार । करत आखेट सपत्तौ ॥ संग सूर सामंत । गहन गिरि बोह सुरत्तौ ॥ एक सहस सँग स्वान । एक सत चीते संगह ॥ उभै सत्त सँग हिरन । करत मन पवन सुभंगह ॥ सम विषम विचर वन सघन घन । तहां सव्य जित तित्त धुन्न ॥ भूल्यौ सुसंग कवियन वनह । और नचीं जन संग दुन्न ॥ छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ६ ॥ एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना । दूहा ॥ विपन विचर जपल अकल, सकल जीव जड जाल ॥ परसंपर बेली विटप, अवलंबि तरु तमाल ॥ छं० ॥ १४ ॥ सघन छांह रवि करन चष, पग तर पसु भजि जात ॥ सरित सोह सम पवन धुनि, सुनत श्रवन झचनात ॥ छं० ॥ १५ ॥ गिरि तट इक सरिता सजल, झिरत झिरन चिहुँ पास ॥ सुतरु छांह फल अमिय सम, बेली विसद विलास ॥ छं० ॥ १६ ॥ ५ पाठान्तर-घत्त । धनुंक । धनुंक । धनुप । आंनन । चक । चध । सद। बदिय । दृक । म्रगा । बिफुरिय । चिहु । उर । दिघ । भ्रंस । सकल । सयलं ॥ ६ पाठान्तर-करन । आखेटक । संपतौ । हृद । बोहर । संग । साथ । त्तिंत । भूल्यो । कबियन ॥