भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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छठां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३०३ दूहा ॥ भद्द जानि कवियन नृपति, नाथ नाम सो चंद । आनस में गंगा बही, अव्व गए सब दंद ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥ जती का प्रसन्न होकर एक मंत्र बतलाना जिसके वश में बावन बीर हैं । कवित्त ॥ प्रसन्न चंद सम जतिय । दिन्न इक मंच दृष्ट जिय ॥ इष्ट आराधत भद्द । प्रगट पचास बीर विय ॥ करि साधन इष्ट साध । व्याधि नासत फल धारिय ॥ गुरु उपदेसद्द पाइ । सकल आधीन अकारिय ॥ धरि कान मंच लीनौ कविय । परसि पाइ अग्गै चलिय ॥ करवे सुपरिप्पा मंच की । रचि आसन अग्गैं बलिय ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥ चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और बीरों का प्रगट होना । दूहा ॥ भली बुरी निर्मित कछू, मेटि न सक्कै कोइ । याही सों भवतव्यता, कहत संयाने लोइ ॥ छं० ॥ २७ ॥ पसु आखेटक करन कौं, संग नृपति वरदाइ । ऐसे में इष्ट भावई, अकसमात हुअ आइ ॥ छं० ॥ २८ ॥ मंच परिख्या करन कौं, बन मझ बैठ्यौ चंद । रचि रचना सुचि स्नान करि, धूप दीप पढ़ि छंद ॥ छं० ॥ २९ ॥ रचि आसन्न गनेस मँछ, सिद्धि बुद्धि लखि लाभ । पुनि मंचह भैरव जपत, उक्कु गरजिय अभ ॥ छं० ॥ ३० ॥ गैन गद्दर गंभीर धुनि, सुनि ससंक भय गात । आनन अग गच्च गंज हुअ, जानि उलक्का पात ॥ छं० ॥ ३१ ॥ सुप दाता माता पिता, सेवक सरन सधार । उपवन बैठे चंद जहँ, द्वै पचास पधार ॥ छं० ॥ ३२ ॥ मंच जंच धारंत मन, आकर्षे जब चंद । प्रगट दरस दीने सबन, कवि उर बध्यौ अनंद ॥ छं० ॥ ३३ ॥ १२ पाठान्तर-नृपति । नांम । आल समैं । आल समय । अब ॥ १३ पाठान्तर-दीन । भट । प्रंचास । ए । नासन । धारीय । अकारीय । पाय । अगों । आगै । करनें । करनैं । परंख्या । अगों ॥