भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 314

३०४ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ६ महा पुरुष पिष्षै जबै, तब सुअ हरष सरीर। दंडव्रत अंजुलि करिय, मन आनंद सधीर ॥ कूं० ॥ ३४ ॥ दू० ॥ १४ ॥ बीरों के रूप आदि का वर्णन ॥ कंद पद्धरी ॥ आनंद चंद दरसंत इंद। सोभा सुभंत वज्रंग दंड ॥ तन तेज तरनि ज्यौं घनह श्रोप। प्रगटी कि किरनि धरि अगिन कोप ॥३५॥ चंदन सुलेप कस्तूर चिच । नभ कमल प्रगटि जनु किरन मिच ॥ जनु अगनित नग छवि तन विसाल। रसना कि बैठि जनु भ्रमर व्याल॥३६॥ मृग मद अयूष जनु पिउष पान। प्रभु मुदित मगन नासा रसान ॥ मईन कपूर छवि अंग हंति । सिर रची जानि विभूत पंति ॥ ३७ ॥ कज्जल सुरेश रचि नेन पंति । सुत उरग कमल जनु कोर पंति ॥ चंदन सुचिच रुचि भाल रेश । रजगुन प्रकासतें अरुन भेष ॥ ३८ ॥ रोचन लिलाट सुभ मुदित मोद । रवि बैठि अरुन जनु आनि गोद ॥ घूंघर घसंकि पाइन विसाल । नृत्तंत जननि जनु अग्ग बाल ॥ ३८ ॥ धूसरस भूर बनि वार सीस । छवि बनी मुकट जनु जटा ईस ॥ बनि विसद कंठ इक्क बेलि माल । आभाति उडग्गन निसापाल ॥ ४० ॥ चंपकनि पुहुप बनि कंठ कांति । रस रमत अमर जनु पीत पंति ॥ नृत्तंत एक संगीत अंत। नारद रिझि कर धरत तंति ॥ ४१ ॥ इक्क परत बध्य इक्क खरंत छय्य । गज नहनि केलि जनु सरित सध्य ॥ इक्क प्रगट होत इक्क दुरै जात । परसंत परस्पर सुमन दात ॥ ४२ ॥ क्कित एक होत गिर गरुअ देह । गरजंत एक जनु घटा मेह ॥ इक्क उघटि सब्द संगीत ताल । इक्क पढत भाष नागह विसाल ॥ ४३ ॥ इक्क ब्रह्म पोष सम करत घोष । पौरांनं प्रगट इक्क वचत मोष ॥ दाढाय इक्क चवैत फुनिंद । इक्क धरत ध्यान जानिक मुनिंद ॥ ४४ ॥ इक्क गरनि मुंड मुष रुंड एक । कुंजर सधार गिर तरन तेक ॥ इक्क मुष्य अगिग ज्वाला उठंत । इक्क परह देह बरिषा उठंत ॥ ४५ ॥ १४ पाठान्तर-निमित । भवितव्यता । सयानं ॥ २७ ॥ को । नृपति । असैं । आय ॥ २८ ॥ परिष्या । को। बैठौ । स्रान । परि । चंद ॥ २९ ॥ गनर्डस । तहां । बुधि । उक । गरजिय ॥ ३० ॥ गगन । आंनन । अंगं । गय गंज । औ । जानिक । उलका ॥ ३१ ॥ जहां । तहां द्वै ॥ ३२ ॥ धारता । आकर्षे । बढयौ ॥ ३३ ॥ पुरुष । पिषे । जबैं । हर्ष । शरीर ॥ ३४