पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएका करत गाज चिक्कार एक । इक सहत सुद्रुत गिरि उड़त केक ॥ इक करत रूप गिरि सिषर कोइ । एका रूप बहुत इक एक होइ ॥ ४६ ॥ धसकंत धरनि इक खात घात । इक स्वास उड़त उपवनह पात ॥ पिपीय चरित ए चंद भट । हर्षित हुल्लास मन में अघट ॥ ४७ ॥ रोमंच अंग उब्भार देह । भैभीति भंति तहँ दिषि एह ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ १५ ॥ कवित्त ॥ जिन देवन दरसंत । देव दानव चिय संकचि ॥ किंनर जप गंध्रब्ब । सर्व सनमुख जिन कंपचि ॥ सिध साधक जिन दरसि । तरसि संकट थिय विखम ॥ महाबीर वलवंत । कचन सचि सकै तिनं क्रम ॥ अद्भुत चरित चंदह चरचि । सुर विचित्त चिय हथ्थ क्रिय ॥ आराधि संच मन ताप सह । सावधान सम्भारि जिय ॥ छं०॥४९॥रू०॥१६॥ दूहा ॥ फुनि सुदिष्ट दूरी करन, अकल भयानक भीर । विना मंत्र को वसि करै, महाकाय वे वीर ॥ छं० ॥ ५० ॥ अनरिति फल काहू करन, किहिकर अनरित फूल । दिव्य वस्त्र काहू करन, नाना वरन अचूल ॥ छं० ॥ ५१ ॥ सत्त मंत को दिष्यित, रज मय के दीसंत । तामस के पिष्ये प्रबल, क्रोध कलह किरतंत ॥ छं० ॥ ५२ ॥ को इक कुंजर मद वहत, कोइक सिंघ सरूप । को इक पन्नग विष गरल, को इक दिष्यित भूप ॥ छं० ॥ ५३ ॥ ब्रह्मरूप को इक बढ़त, को इक तापस भेष । जूप रूप तसकर सुको, छिन में भेष अलेष ॥ छं० ॥ ५४ ॥ अग्निज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह । चक्र पवन डंडूर को, केतन कंकर षेह ॥ छं० ॥ ५५ ॥
१५ पाठान्तर-ज्यों । उप । आन ॥ ३५ ॥ अग्नित । अमर ॥ ३६ ॥ सिगमद । पियूप । पानि । अंगहुंति । विभूति ॥ ३७ ॥ नैन । प्रकाश ॥ ३८ ॥ आंनि । घुघर । घर्मकि । पांयन । रसाल । नृत्यंत । अग ॥ ३९ ॥ वेलि । आभाकि । उड़गन । निशापाल ॥ ४० ॥ नृत्यंत । नारद । रीझ ॥ ४१ ॥ हथ । तरुन । स्वस्थ्य । दुरे ॥ ४२ ॥ शब्द ॥ ४३ ॥ ब्रह्म पोपं । पोरान । एक । ध्वांन जांनि कै । जान कि । मुष । अग्नि । बुठंत ॥ ४५ ॥ चिकार । उठंत ॥ ४६ ॥ घमकंति । स्वांस । पिपिय । पिष्यिय । चरित्रं । भट । मैं । अघट्टि । ॥ ४७ ॥ उभार । भय । तहां । दिषि ॥ ४८ ॥ १६ पाठान्तर-जप्प । गंधर्व । सिद्ध । महावीर । अदभुत । चरितं । हथ । सावधानं ॥