पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय ८ सुमन दृष्टि कोइक करत, के फल अन्न रसंस । रुधिर मंस तन चमकते, आप परस्पर संस ॥ छं० ॥५६॥ रू० ॥ १७॥ चन्द का बीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥ दूहा ॥ दिषि चंद आनंद मन, धनि मुझ गुर उपदेस । महा पुरुष पिषे प्रसन, ओ मन मिटि अंदेस ॥ छं० ॥ ५७॥ रू० ॥ १८ ॥ चन्द का बीरों की पूजा करना ॥ कवित्त ॥ सनमुख अंजुलि जाई, करी दंडौत सबन कहुँ ॥ कुसुमंजलि सिर मंडि । धूप नैवेद समुच्च सहुँ ॥ आरति सबनि उतारि । नयन नैनह सब मिलिय ॥ रहे पिषि सब बीर । जांनि पंनग वच षिल्लिय ॥ किंनो सुभ गति भव भवना । चित चंचल सुस्थिर करिय ॥ भय चंद चंद तन मन प्रसन । अस अछूत पुज्जिय रखिय ॥ छं०॥५८॥ रू० १८ ॥ चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशासन मंत्र ग्रहण करना ॥ कवित्त ॥ जिन बीरन बसि करन । जोग जोगी हठ मंडहि ॥ जिन बीरन बसि करन । दुंद आराधन तंडहि ॥ जिन बीरन वसि करन । चरन सत गुर अभ्यासहि ॥ जिन बीरन बसि करन । प्रेत भूतन विसवासहि ॥ सो बीर पंच हुअ सहज सें । जती एक परसाद किय ॥ प्रथिराज भाग बरदाहु बर । सचु समन् इह मंच दिय ॥ छं० ॥ ५८॥ रू० ॥ २० ॥ क्षेत्रपालों (बीरों) का पूछना कि हम लोगों को क्यों बुलाया है ॥ १७ पाठान्तर—करण । भयानक । बे ॥ ५० ॥ काहूं कद्दण । बर्षे ॥ ५१ ॥ सत । मत । दिषियत । में । पिषे । कृत्यंतं ॥ ५२ ॥ पंन्नग । दिषित ॥ ५३ ॥ कोई । भेस । अभेस ॥ ५४ ॥ बरसं । मंदूर ॥ ५५ ॥ केइ । करतह । रसस । मंतं । आपस पद परसंस ॥ ५६ ॥ १८ पाठान्तर—दिषि । पिषे । प्रसंन । अंदेश ॥ १९ पाठान्तर—जाई । दंडोत । कहौं । कहुं । नैवद । सहौं । सहुं । सबन । नैन । नैनन । मिलिय । पिषि । जांनि । खिलिय । किनी । भवना । सुथिर । प्रसंन । पूजित ॥ २० पाठान्तर-अधंम आतम भ्रम मंडहि । वाशिकरन । विसवासहि । सोइ । पृथ्वीराज । शत्रु ॥