पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ३०७ दूहा ॥ बेतणउ तव चंद सौं । किन्न हुकम तुंफेव ॥ जंच संच आराध हुत । क्यौं आकर्षे सेव ॥ छं० ॥ ६० ॥ रू० ॥ २१ ॥ चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥ साटक ॥ आकर्षय च देव सेव सवयं, पिथ्यं हितं कारनं । विपमं वंक सहाय आय.भहं, घहं भया भैकरं ॥ इच्छेयं मन पेमयं च वरयं, दंडं दत्तं दारुनं । श्रीवीराधि सुरिंद चंद नमयं, चर्नस्य सर्नागतं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ रू० ॥ २२ ॥ चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे आप राम-रावण आदि की लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही पृथ्वीराज की भी करना ॥ कवित्त ॥ मद्दनि मच्चि जब सुरनि । जुद्ध असुरां सुर जब्बह ॥ अमरन अमिय अभीय । मोहि असुरन तव तब्बद्द ॥ काली सुर मच्छिास । त्रिपुर जित्तिय महिषासुर ॥ जालंधर भसमास । राम दसकंध अभंगुर ॥ जहँ जहँ सुदेव वंकम परिय । करिय अभय तुम देव तव ॥ देवाधि देव दानव दलन । चरन सरन हम रप्पि अब ॥ छं० ॥ ६२ ॥ रु० ॥ २३ ॥ बीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़ पड़े तब स्मरण करना ॥ कवित्त ॥ षिनक मैंण'रचि देव । बचन चंदह उच्चारिय ॥ हम प्रसंन तुझ सेंव, सुनहु भटं सुभ कारिय ॥ समर संग तुअ राज, जब सु संकट षल जानिय । तहाँ सुमरंत सु चंद, दंड हंनिहैं सुन मानिय ॥ २१ पाठान्तर-सों हुकंम । सु ॥ २२ पाठान्तर-पिथं । वंक । सुभटं । घंटं । इच्छेयं । सुरीदं । चरनस्य । सरनागतं ॥ २३ पाठान्तर-मह्न । प्रचि । असुरांन । जबह । अमिय । अमीय । मोह । तबह । रांम । दसमथ । जहां २ । संकट । रषि ॥