भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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सिर धारि चंद बाचा लइय, सदा प्रसन सेवक रहै । करि क्रिपा नाथ भहं सरिस, विवरि नाम बीरन कहै ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ २४ ॥ भैरव का एक बीर को आज्ञा देना कि सब बीरों का नाम बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥ दूहा ॥ तब भैरव इक गन सरिस, किंन हुकम घर नंद । विवरि नाम वीरन सबन, कहि पिछनावहु चंद ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ २५ ॥ सब बीरों का नाम गुण कथन ॥ दूहा ॥ वज्रपाट ता नाम गन । घन तन घोर भयंक्क ॥ पृथुक नाम बरनत सबन । सुनत मिटै तन संक्क ॥ छं० ॥ ६५ ॥ रु० ॥ २६ ॥ छंद पद्धरी ॥ गुन ईस चरन गुन गहर गाइ । फल सिद्धि बुद्धि जा नाम पाइ ॥ बानिय प्रसंन जो प्रथम होइ । करौं प्रसन बीर पचास दोइ ॥ ६६ ॥ आहूक्क बीर यह प्रथम खेव ॥ तिचि प्रसन प्रसन सब जानि देव ॥ वपुलाडू बीर हंनत बिनोद ॥ जिचि प्रसन सदा आनंद सोद ॥ ६७ ॥ बुँदिआइ बीर बन्दौ सनेह ॥ जल मय सुथलनि करि करसि सेह ॥ आनल्लप्रचारिय प्रबल बीर ॥ जिचि जुरत दनुज अरधरै भोर ॥ ६८ ॥ नारीय क्रीडनह दोड कोडू ॥ ब्रह्मा उपास करै टूक दोडू ॥ सूचीय अंज अनगंज बीर ॥ बज्रह सुभंजि दोइ करै चीर ॥ ६९ ॥ समसान लोटना बीर बंक ॥ तिचि पीर भीत अन संक भंक ॥ गढ उपडनाडू तो बीर नाम ॥ क्रोधंत कूट नह लखै ठाम ॥ ७० ॥ सामुद्र तिरन हूह बीर बाव ॥ सप्तम समुद्र मनु वहत बाव ॥ सामुद्र सोष अनभंग बीर ॥ दनु देव समुद्रन घरत नीर ॥ ७१ ॥ २४ पांठान्तर-मोंन । वचन । उच्चारिय । उच्चारीय । प्रसन । हुव । हुअ । भटं । कारीय । जानीय । तहां । दंड हमें सनमानीय । सनमांनिय । सदां । प्रसंन । करिं । भट्ठह । बिचारि । नांम । कहैं ॥ २५ पाठान्तर-दोहरा । नांम ॥ २६ पाठान्तर-नांम । पृथक । प्रयुक्त । बरनन । मिटे ॥