पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 319, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठां समय ११] पृथ्वीराजरासो । ३०६ दूच लोच भंजनिय वीर दीन्न ॥ लारन पच्चार भंजे सरीस ॥ संताना चोट दूच नाम धारि । भंजे जँजीर जनु सूत तार ॥ ७२ ॥ विस पाय राय सो वीर जांनि । पचवंत जह्र जनु दूध पानि ॥ रुँडमाल नाम लोहू है देष । पिप्पिय भयंक्र दृक कालसेष ॥ ७३ ॥ अगिग्या वीर कुप्पंत वार । प्रब्बतप्रजारि सो करत खार ॥ विषपिया वीर वीराधि वीर । तिचि क्रोध दनुज संघरै भीर ॥ ७४ ॥ जमघंठ नाम औघह जोर । जिन सहज गाज घन घोर खोर ॥ कान्नाइ नाम दूच वीर लेषि । सब तजै भीर से भीत देषि ॥ ७५ ॥ कुरखाइ नाम दूच चालन जाइ । सुर असुर नाग तातकै पाइ ॥ अगिक्रान्त वीर जब होत कोच । तब जरत तेज गिरसिषर षोच ॥ ७६ ॥ विपकांत वीर अत्यंत वंक । जिन पिष्पि कंक अन संक संक ॥ रगतिया वीर पग रक्त रंग । अरि रक्त वाह सो करत भंग ॥ ७७ ॥ कोइलाइ नाम जो सेव पाइ । तिन कष्ट होत भग्गै सदाइ ॥ कालका नाम करौ वीर सेव । तिचि प्रसन काम दुग्धं कि देव ॥ ७८ ॥ कालवेताइ नाम विन वीर कौन । गम अगम थान जनु वहत पौन काल घटाइ बज्रंग वान । कोपंत दनुज दच्च चरन पान ॥ ७९ ॥ इंद्र वीराइ वल इंद्र जोर । चौगुन विलास तन धरत रोर ॥ जम वीराइ वीर क्रत्यन्त कोच । सत्तउ समुद्र जल करत गोच ॥ ८० ॥ देवग्नि नाम करौं सेव पाइ । सुभ धने कर्ने दाता सदाइ ॥ उँकार वीर नमि करौं ध्यान । जिहि प्रसन सदा आनन्द ग्यान ॥ ८१ ॥ २७ पाठान्तर-गाय । नांम । पाय । बांनी । प्रसन । होय । करौं। दोय ॥ ६६ ॥ आइझ । तिहिं । लाय । जिहिं ॥ ६७ ॥ बुंदि । स एह । थलन । अनल । प्रहारीय । जिहिं ॥ ६८ ॥ छोड़- नहू । करैं । दोय । अनभंग । दो ॥ ६९ ॥ शमशान । तिहि संक बंक अनभीत वीर । नाय नांम । हल- हलै ठांम ॥ ७० ॥ सामंद । जनु । बहतु । बायु । सासमुद्र । शोषा सोपै समुद्र सब पिवै नीर ॥ ७१ ॥ और । जंजीर ॥ ७२ ॥ बिसप्रापरा । पांनि । मांनि । रुंडमाल । पिषिय । मय ॥ ७३ ॥ अगिया । कोपंत । पब्बत । प्रजार । करै । विषपियाइ । तिहिं ॥ ७४ ॥ यमघंट घाट । चौघट । औघट । कालाय । वीर । लेष । तजैं । देष ॥ ७५ ॥ कुरलाय । नांम । तिहिं । जाई। पाय । क्रोध । पोध । तब जरत सिपरं गिर तेज पोध ॥ ७६ ॥ वीर । बंक । पिपि । बाह ॥ ७७ ॥ कोयला । नांम । भग्गै । कालकाइ । कालका । नांम । करो । तिहिं ॥ ७८ ॥ बिन । किन । कौंन । बहि ।