पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १४ कवित्त ॥ सघन वृष घन छांह । जानि बहल नभ वासिय ॥ देषत पथ्य गिरंत । वेलि अवलम्बि विलासिय ॥ खोर खोर कोकिलन । (रौर)* चीह पप्पीह पुकारत ॥ सुमन सुगन्ध सबूछ । अंध मधुकर मधु आरत ॥ बहु कुची बाज सिंचान बच । खंगूर लाग लेयन फिरैं ॥ देषन्त जनावर अष ची । जनु प्रकास तारा गिरैं ॥ छं० ॥ ८६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ कवित्त ॥ तहँ खेलत पृथिराज । संग सामंत जङ्ग जुरि ॥ घट सुडोरि सँग स्वान । लेत ते जीव सबन जुरि ॥ बगुर घेरि विष्षंन । अप्प झुंजन में मंडिय ॥ तक्क तके इक रचिय । चक्कि घेदा षिक्ष कंडिय ॥ भंचराइ भग्गि पसु उठि चले । आवै आवै होइ रंचि ॥ परसपर खोर वे करत सुनि । यों सिकार चन्दह सुवचि ॥ छं० ॥ ८७ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ तिक्क भाल ससि षण्ड । गण्ड मद भमर बिलुड्डिय ॥ सुरभि तेज सिंदूर । सुमन संपति मन सुद्धिय ॥ सुद्ध दुद्ध जिम दसन । विसद बानी जिम निम्मल ॥ परस मुसल असि चर्म । हत्थ पंचम मोदक कल ॥ पुज्जिय सुचंद सुरइन्दजग । गवरिनंद दूषन दुरय ॥ कंपच्चि सिकार गज तुंड डर । सब विघंन गनपति घरय ॥ छं० ॥ ८८ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३१ पाठान्तर-वृष्य । जांनि । बदल पद्म । पथ । * अधिक पाठ है । पपीह । सीचान । लंगुरुं । फिरें । देषत । जिनावर । भक्षक ही भक्षक हैं। जनुं । आकास । गिरें ॥ ३२ पाठान्तरः-तहां । सुं डोरि । संग । स्वांन । बंगुर । घेरोय । वियन । पूंडिय । हकि । भयराय । भगि । हुइ । रहिय । लहिय ॥ ३३ पाठान्तरः-गंड चम्भर मदलुट्ठिय । सुब्भि । संपत्ति । दुद्ध । दूध मुद्ध । वांनी । ज़िमल । चर्म । हथ । पुजिय ॥