पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय १६
ऊजर अरि पुरं घरह । सैल तट उड्डन अद्दह ॥ हथ्य जोरि सब सुब्भि । उब्भ दिप्पहि कित लद्दह ॥ फल फूल इष्प भु प्रकास थन । बन उपवन घन संचरहि ॥ ढुंढत उढाल उढाल चिय । भुक्कारन बहु झुक्क्रहि ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु ॥ ३७ ॥ कवित्त ॥ नहिं गब्बत करि गब्ब । नहिन गज्जत घन गज्जत ॥ षेलत नहिय नयंन सिंघ कढि बोलत लज्जत ॥ भुञ्जन मड्डि संचरत । नहिन संचरत दुरद बन ॥ चरन लेष लुप्पतसु । पुंछ शृज मुत्तिय मग गन ॥ धक धकहि धुकहि तकहि चकहि । दिग्ध उसासन उल्हसहि ॥ प्रथिराज कुंवर कोबंड डर । गिर कंदर केसर बसहि ॥ छं० ॥ १०३ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ कवित्त ॥ बग्गुर अगिनत परत । क्तिकि फंदन पगविड़न ॥ कितेक ष्खलन मरत । कित्तिक स्वानन मद्द सिद्धत ॥ घंटनरागन कितक । कितक चीते तकि दब्बत ॥ बाज सिंचान कुहीन । झपटि चंचनु फल चब्बत ॥ घन कूच सिकारन है रची । अजि न जीव कहुं जै सकै ॥ बल्लवंत बाघ हथ्थिय अजर । पक्कि हंकि लीजै धकै ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ कवित्त ॥ गाडी किए कितेक । कितक उंटन पर डारे । पत राषे घर कितक । कितक हथ्थी पर धारे ॥ काचर कंधन कितक । कितक स्वानन मुष तुह्त ॥ बिंकी सर्प विषंग । मंच वादी मिल लुह्त ॥
३७ पाठान्तरः-गिरि । कक्रह । गुक्रह । निझर । कुलान । कूलह । सेल । अधह । हथ । सुभि । उभ । दिषहि । दृष । भू । भूपूकारनिबहुसुकरहि ॥ ३८. पाठान्तरः-नहिं । गबनु गब । गजत । नंन । लाजत । भुञ्जयन । रेष । लुंपतसु । पुछ । मग मुति । हिंचकहि । दिघ । उल्हसै । पृथीराज । कुंअर । केहरि । बसै ॥ ३९ पाठान्तरः-बगुरि । कितेक । स्वांनन । दबत । चंचनु । पल । चूब्बत । चूवत । क॑हु । कहुं । अथिय । हथीय । हथिय । हक्ति ॥