पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 331, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३२१ दूहा ॥ तब कहैं कुँअर सामन्त सब, काल्हि आखेटक रंग । भयौ सुर सुभैं एक भय, आलस ही सें गंग ॥ छं० ॥ १४१ ॥ रु० ॥ ५८ ॥ कवित्त ॥ अपरंजे आखेट । चन्द भुल्यौ सुवह वन ॥ जंगम इक तापस । मिल्यौ वरदाइ सुद्ध मन ॥ प्रसन भयौ कविचन्द । वीर मन्त्रह दीनौ वर ॥ अजमायौ कविचन्द । वीर बावन दरस चिर ॥ तिन देखि अमित चरितह सुनत । बरनै कवि बरदाइ अति ॥ अनेक रूप अनेक गुन । अनँत गति अनतह सुमति ॥ छं० ॥ १४२ ॥ रु० ६० ॥ सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब आरत हैं इन की बात सत्य नहीं माननी चाहिए ॥ अरिल्ल ॥ प्रसन सूर सामन्त सकल वर । हासे अप्प परस्पर सुब्भर ॥ भट नट चारन जू आरत्तह । इनकी गति न मनियै सत्तह ॥ छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ६० ॥ कैमास ने कहा कि चन्द को देवी ने वरदान दिया है वह सचमुच कोई अवतार है ॥ गाथा ॥ कथिय वर कैमासं । देवी वरदाय चन्द भटायं ॥ अस तिन चवै असेसं । सत्यं रूप सत्य अवतारं ॥ छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ६१ ॥ कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर उसने यह बात प्रसन्न करने के लिये गढ़ी है । ५८ पाठान्तर-कुमर । कुंअर । काल्हि ॥ ६० पाठान्तर-अपरजेन भयौ । कविचंद । भूल्यो । बट । तापस । मिल्यौ । चंद । बरने । बरदाय । अनेक । अनत ॥ ६० पाठान्तर-प्रसंन । सुभर । भट्ट । नट्ट । चारंन । जु । आरतह । मनिये ॥ ६१ पाठान्तर-कथिय । भटायं ॥