भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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३२० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय २२ राजन कुँआर मधि सूर साज। देवतन मद्धि जनु देवराज ॥ गिरिराज मद्धि सब गिरन रज्जं। देखन्त सभा सुभ इन्द्र लज्ज ॥ कं० ॥ १३६ ॥ रू० ॥ ५५ ॥ बीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥ दूहा ॥ बैठि सभा पृथिराज रचि, आय सुरति निज चित्त ॥ वत्त बीर बरदान की, अति उमंग उलसित्त ॥ कं० ॥ १३७ ॥ रू० ५६ ॥ रचै न आनँद कुँअर हिय, उगमत कण्ठ प्रमान । कहै न कासों बत्त बर, मानों दुद्ध उफान ॥ कं० ॥ १३८ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ कैमास का हाथ जोड़कर पूछना कि आपके मुख पर कुछ उत्साह दिखाई देता है पर आप खुलकर कहते क्यों नहीं ? अरिल्ल ॥ पानि जोरि कयमास । बदै तब राज प्रति ॥ उर अवलोकित उलसत । सामन्त राज अति ॥ को कारन मुख चारु । न कथ्यिहि बत्त संति ॥ सुभर सूर सामन्त जु । विनवत्त राज प्रति ॥ कं० ॥ १४० ॥ रु० ॥ ५८ ॥ पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का समाचार कहना ॥ ५५ पाठान्तर-क्षांन । दान् । कुआंर । कुआर । होय । वजे । निसांन । मांन ॥ १३२ ॥ पूरन । तैज । वीरत । अभूल । बांन । दिट्ठि । जांन ॥ १३३ ॥ आय । चतुर्हूस । मंति । गोइंद । आय । आई । कुमर । कमल । नवाय ॥ १३४ ॥ चहुआन । भारथ । कथ । अंनि अंनी । आय । आई । मित । अप्रमाय ॥ १३५ ॥ कुंगार । कुआर । देवतनु । मधि । मधि । रज । शुभ । लज ॥ १३६ ॥ ५६ पाठान्तर-पृथीराज । वरदांन । अल्हसित्त ॥ ५७ पाठान्तर-आनंद । कुंगर । कुंमर । प्रमांन । मनों । दूध । । उफांन ॥ ५८ पाठान्तर-चंद्नायना । पांनि । उल्हसत । सांमंत ॥ १३६ ॥ चारु । कथि । बत । विनवत ॥ १४० ॥