भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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छठां समय २१] पृथ्थीराजरासो । ३१६ दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥ दूहा ॥ प्रात राज जग्गे प्रथम, गो दुज दरसन कीन । देहकत्ति पुनि होइ सुचि, पावन पानि सुडीन ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रू० ॥ ५२ ॥ करि पावन पवित्र वर, मोचन सुरभि सुतेल । मर्दनीक मर्दन करै, बढै धात तन बेल ॥ छं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ ५३ ॥ नहाकर दस गोदान, दस तोला सोना और बहुत सा अन्न दान देना ॥ करि सनान गंगोदकछ, दिय सुगाइ दस दान । दस तोला तुलि हेम दिय, अंन दान अमान ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥ महल में पृथ्वीराज का बिराजना और सरदारों का आना ॥ इन्द् पद्धरी ॥ करि स्नान दान सुचि रूचि कुंचार। होइ देवरूप साक्षात चार ॥ कीनौ सु मङ्गल बज्जै निसान । आनन्द सकल सामन्त मान ॥ १३२ ॥ आये सुमचल सामंत सूर । पूरंन तेज वीरत्त पूर ॥ अनभङ्ग अङ्ग अनभूल बांन। जिन दिट्ठ अरिय पावै न जान ॥ १३३ ॥ कैमास आइ कीनौ जुहार । विद्या सु चतुर्दस मत्ति सार ॥ गोयन्दराज गहिलौत आइ । बैठो सुकुंचर कमलं नवाइ ॥ १३४ ॥ चहुवान कान्ह आयौ अभङ्ग । भारत्य कथ्य भीषम प्रसङ्ग ॥ अनि अनी सुभर बैठे सुआइ । अन मित्त मत्ति बल अप्रमाइ ॥१३५॥ ५२ पाठान्तर—गो । देह कंतिं । पुन: । शुचि । पांन । पांनि ॥ ५३ पाठान्तर—पावन । सुरंभ । सुरभ । मर्द्दनीक । मर्द्दन ॥ ५४ पाठान्तर—सुस्नान । गंगोदकहि । दांन । अन । दांन । अप्रमांन । ६