पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो ३२५ सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों का वश में न आना ॥ दूहा ॥ दौरि सकल सामन्त मिलि, करे अनन्त उपाहू ॥ रोस लगे छुटै नहीं, भई सुहायो चाहू ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ चिहूं ओर हरषी छुटै, परै अगड सुमार ॥ गोना लगे गिलोल्ल गुरु, छुटै न तो इसरार ॥ छं० ॥ १६० ॥ रु० ॥ ७६ ॥ गाथा ॥ वर वावंन सु वीरं । कौतिग लषन्त सूर सामन्तं ॥ करे अनन्त कळापं । नह छुटन्त गज गरुं च्यारू ॥ छं० ॥ १६१ ॥ रु० ॥ ७७ ॥ चन्द का बावन बीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन हाथियों को छुड़ाकर बाँध दीजिए ॥ दूहा ॥ तब कर जोरिय चन्द कवि, अग्गे वांवन वीर ॥ तुम सु छुडावहु मन्त कछु, बहुरि जरहु जञ्जीर ॥ छं० ॥ १६२ ॥ रु० ॥ ७८ ॥ भैरव की आज्ञा से बीरों का हाथियों को ज़ंजीर से बाँध देना ॥ अरिल्ल ॥ तब भैरव भूवाल वीर वर । कीन हुकम कालीय ऊंच कर ॥ छोरावहु गजराज पांनि गछि । बहुरि जरौ जञ्जोर थान कहि ॥ छं० ॥ १६३ ॥ रु० ॥ ७९ ॥ दूहा ॥ तब काली दोखौ तलपि । गज्ज कुराइ समत्थ ॥ उभै पांनि सौं रद उभै । गहै उभै वरहत्थ ॥ छं० ॥ १६४ ॥ रु० ॥ ८० ॥ ७५ पाठान्तर-दोरि । सामंत । करै । उपाय । लगैं । छुटै । नही । स ॥ ७६ पाठान्तर-चिहुं । उर । परे सुगड पर मार । लगें । गुरु । छुटै । तो । अस ॥ ७७ पाठान्तर-बांधन । । सामंतं । करै । गुरुयादं । गरुआई ॥ ७८ पाठान्तर-बावन । बांबंन । स ॥ ७९ पाठान्तर-भुवाल । किंन । उंच । छोरावौ । पांनि । जरौ । यांनि । कहिं । ८० पाठान्तर-गज । छोराय । समय । पांनि । सो । सं । हथ ॥