पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २८ यह कौतुक देखकर सरदारों का आश्चर्य में होना और सब का दर्बार में आकर बैठना ॥ गाथा ॥. बंधन दीन सु पाइं । कौतिगं दिष्ययं सब्ब सूरं ॥ मंनिय मन आचिज्जं । बैठे फेरि आइ दिवानं ॥ छं० ॥ १६५ ॥ रु० ॥ ८१ ॥ पृथ्वीराज का सब बीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम लेकर सब बीरों को पहिचनवाना ॥ परसे बीर सु सब्बं । करी प्रथिराज पांइं परिनामं ॥ प्रथक चन्द कथि नामं । पच्चिचांने बीर बीरायं ॥ छं० ॥ १६६ ॥ रु० ॥ ८२ ॥ चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को बुलाया है इस से इन की बलि दो पृथ्वीराज का बावन घड़ा मदिरा बावन बकरे मँगाकर बलि देना और भैरव आदि की पूजा करना । छंद पद्धरी ॥ पहिचांनि राज प्रथिराज बीर । भयौ उदित मन आनंद धीर ॥ कविचंद कथिय प्रथिराज राज । इन देहु सुबल व्याकुल समाज ॥ १६७ ॥ विन कज्ज अप्प आराध कीन । नवि विछत कुसज्ज खब्भो सुईन ॥ बावन घट वारुनि मँगाइ । बावन बीर प्रति घट पाइ ॥ १६८ ॥ बावन अजासुत भष आंनि । दीने सु आदि भैरव निदांन ॥ सिंदूर तेल पुहपनि अरचि । सन्तोष पोषि सब तन चरचि ॥ छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ ८३ ॥ ८१ पाठान्तर-दीय । सु पायं । पाई । सब्ब देषीयं । दिषय सब । मनियं । आचिजं । फिरि । आय । दीवांनं ४ ८२ पाठान्तर-कर । करि । पाय । पृथुक । करि ॥ - ८३ पाठान्तर-पहिचानि । प्रथीराज । भयो । श्रीर । कहीय । प्रथीराज । स । बाकुल ॥ १६७ ॥, कज । कुशल । लभौं । बावन । घट । मंगाई । घट । पान ॥ १६८ ॥ भष । आंनि । निदान । ओरचि । चरचि ॥ १६९ ॥