भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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छठां समय = ६] पृथ्‍वीराजरासौ । ३२७ वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर माँगों सो हम दें और अब हमको विदा करो ॥ दूहा ॥ भये त्रिपत वीराधिवर, पूरन डक्क डकार ॥ अनि आनन्दत उल्हसंत, बोले वयन वकार ॥ छं० ॥ १७० ॥ रु० ॥ ८४ ॥ मङ्गि मङ्गि महिपत्ति तुअ । सोइ समर्प्पै आज ॥ दै सुविहा न विलम्ब करि । जु बाकु चित्त तुअ काज ॥ छं० ॥ १७१ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय हमारी सहायता कीजिएगा ॥ गाथा ! जंपे वर बरदाई । तुम वरं वीरं देव देवाधिं ॥ औ प्रथिराज सहाई । जुद्धं जय राज जुहाईं ॥ छं० ॥ १७२ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा समय आवै तब हम को याद करना ॥ गाथा ॥ तब वर भैरव वीरं । उच्चारीगं संसुप्पं चन्दं ॥ जं तुंम वंकट ठारं । तं सँभारं विचित्त अम्हाएं ॥ छं० ॥ १७३ ॥ रु० ॥ ८७ ॥ गाथा ॥ परतिषि अम्ह सुपुह्वं । करयं जुद्धं तव्व साहस्सं ॥ जथ्यं चडिउन चन्दं । तथ्यं करै न हम आगमं ॥ छं० ॥ १७४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ ८४ पाठान्तर-नृपति । डंक । डक । आनन्द तन । बैन ॥ ८५ पाठान्तर-महिपति । समर्प्यै । दैह । तूं कछु चिंतत काज ॥ ८६ पाठान्तर-जंपै । वर । बीर । देवधि । वीर देवाधि । जुटाई ॥ ८७ पाठान्तर-उच्चारिग चंद संमुषं । तुंम । वंकठ । ठौरैं । संभारै । संभारे । विचित्र । अम्हाई ॥ ८८ पाठान्तर-अंम्ह । जुहु । तब । साहसं । जयं । तथं । हंम्म । आगमं ॥ ९०