पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ३० बचन देकर बीरों का बिदा होना, सरदारों का चन्द की बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज का चन्द पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥ दूहा ॥ दइय वाच सब बीर नै, बहुराए कवि चन्द ॥ सब सामंत अनन्द भौ । दरसत नट्ठे दन्द ॥ छं० ॥ १७५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ सत्य करै मान्यौ सकल । हरषित भय प्रथिराज ॥ प्रेम बढ्यौ अति चन्द सौं । साचस रीत समाज ॥ छं० ॥ १७६ ॥ रु० ॥ ६० ॥ पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र बतला दो, चन्द का सब को मन्त्र बतलाना ॥ गाथा ॥ तब कूंअर कहि चन्दं । देहुं मन्त्रं सव्वं सामन्तं ॥ तब कहि मन्त्रं चन्दं । कीन अप्प अप्पं सहायं ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ ६१ ॥* चन्द को बीस गाँव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥ दूहा ॥ बीस गांव कविचन्द प्रति, करी कुँअर बगसीस ॥ एक बाजि साजति सजहि । दियौ सु सम्भरि ईस ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ६२ ॥ इति श्रीकविचन्द विरचिते प्रथिराजरासके आखेटक बीरबरदान वर्णनं नाम षष्ठ प्रस्ताव सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥ ८६ पाठान्तर-बीरनैं । सामंत । नठै ॥ ६० पाठान्तर-सति । करे । मंन्यौ । हरषत । प्रथौराजं । समाजं ॥ ६१ पाठान्तर-देहु । मंत्र । सब । अप्प । अप ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ६२ पाठान्तर-गांम । कुअर । कुंअर । सजि । दीयौ ॥