भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 470 में से

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पृष्ठ 339

अथ नाहर राय कथा वर्णनं लिख्यते ॥ —❖— ( सातवां समय ) सोमेस्वर देव का शिवरात्रि का व्रत जागरण करके सोने की तुला दान करना और उसे बांट देना ॥ दूहा ॥ ग्यारह सौ गुन तीस वदि, फागुन चवदसि सोम ॥ सिवरत्ती सोमेस नृप, निसा मण्डि जप होम ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ पञ्च गव्व अस्नान करि, सीस सहस घट मण्डि ॥ दीपदान घृत सहस शिव, कुसुमंजलि सिर व्हंडि ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ शिव उपास सोमेस वर, पञ्च उपासि सुराज ॥ सदा मोह भक्ती सुगुर, करिय कित्ति कविराज् ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ श्लोक ॥ शिवशिवा उपास्य राजन्, वीर्य देवन कामयम् ॥ कविचन्द महावाणी, प्रगट रूपेण विस्मितम् ॥ छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥ दूहा ॥ चतुर जाम जग्गिय नृपति, कनक तुला तहँ कीन ॥ प्रात समै वर दुजन कहुँ, बंटि अप्प कर दीन ॥ छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥ १ पाठान्तर—दोहा । सैं । सैं । सुनि । चवदिसि । सिवरती । नृप ॥ इस रूपक में संवत् ११२६ अनन्द साक वा पृथ्वीराज का तृतीय साक है । इस का वर्णन कवि ने आदि पर्व्व के रूपक ३५५ । ३५६, पृष्ठ १३८ में किया है । तदनुसार इसमें अन्तर के ९० । ९१ वर्ष जोड़ने से ११२६ + ६० । ९१=१२१६ । १२२० वर्त्तमान विक्रमी होगा ॥ २ पाठान्तर—पचगव्य । अस्नानं । सहस्र । दान । सहस्र । कुसुमांजलि । शिर ॥ ३ पाठान्तर—शिव । स राज । स गुर ॥ ४ पाठान्तर—शिवसिवा । राजं । राज्यं । धीर्यं । कामयं । वांनी । रूपेन । विस्मितं. ॥ ५ पाठान्तर—जाम । तहां । समे । कहौं ॥