भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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३३० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २ अन्न अमार अपार उठि, जिन्हि लीनौ दिय ताहि ॥ करस भोग भोजन भले, रची न मनसा काहि ॥ छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥ उभय ईस अग सोम पुनि, अस्तुति मंडिड समुष्ष ॥ तब चिनेन तन ताप हर, संचन सेवक सुष्ष ॥ छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥ शिव जी की स्तुति करना ॥ कवित्त ॥ विदित सरन अति चपल । विमल मति कञ्ज निचक्खिनि ॥ गीत राग रस रटित । सती लंपट विस भच्छिन ॥ भुगति दैन जन विभव । भूर भूक्षित तन सोभित ॥ त्रिपुर दहन कविचन्द । केन कारन कृत लोक्कित ॥ श्रीविश्वनाथ संमित गवन । गरल त्रिलोचन रस कुसल ॥ मुष अमल कमल परिमल बहुत । भुगति चारु चर्मेन असन ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥ छन्द पद्धरी ॥ जत गरल कंठ दीसद्दति वोय । जिम चित प्रगट संसार नीय ॥ सारङ्ग उल्ह तृन पान पानि । दिव तुङ्ग जाल जब जवनि मानि ॥ ९ ॥* जट मुकुट गंग दीसद्दि उतङ्ग । सोभन्त चन्द लिल्लाट रङ्ग ॥ सारङ्ग सूल सादूल चर्म । सेवक सहाय अघ हरत कर्म ॥ १० ॥ कटि विकट निकट नटवत चिभङ्ग । गनभूत लेय विभूत अङ्ग ॥ बुन्द जा काम जा आप झूल । जैजै सुईस माया अभूल ॥ छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ९ ॥ साटक ॥ कल्याणी कपञ्चाल बाहु गह्यौ, गिरज्जाइ सारङ्गनौ ॥ बीभच्छौ रस तव्य नित्य रतयौ, मुब्वौ सदा तुङ्गयौ ॥ ६ पाठान्तर-अमरअच । उठि । जिहिं । नहीं ॥ ७ पाठान्तर-मंडिय मुष । म stir समुष्ष ॥ ८ पाठान्तर-विन्नछन । विन्नच्छिनि । वियमक्षिन । विभौ । कृत । गवन । कुषल । चांद । चर्म्मन । भसल ॥ ९ पाठान्तर-जुत । दीसहिति । जम । पांनि पांनि । * "दिव तुंग जाल दिव दिव न मांन" संवत १६४७ की पुस्तक में पाठ है ॥ ९ ॥ लिलाट । सादूल । चर्म । कर्म । विभूत । अभूल ॥