पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ३३१ रुद्दो रुद्ररि पाय नग्नि उरतो, हास्यं हसं सुक्खरं ॥ जामतं गिरिज्ञानिनं विरचयौ, कर्नोय कालं चयं ॥ छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ १० ॥ साटक ॥ वासं गौरि श्रृंगार हास्य नगनं, कर्नोय कामं चयं ॥ रौद्रं रौद्ररि पाय मार दमनं, वीरं चिनेचं ज्वलं ॥ भै भीतं द्विषि अङ्ग भङ्ग अद्दितं, वीभच्छ नहव्वतं ॥ सान्तं संमित जोग दीन अदभू, नौ रस्त रस्सं शिवं ॥ छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ११ ॥ शिवजी की स्तुति करके सोमेश्वर देव का अपने कुमार के विवाह के लिये नाहर राय के पास दूत भेजना ॥ दूहा ॥ सा देवह करि अस्तुतो, वर सोमेस कुमार ॥ नाहरराइ नरिंदं कौं, दूत संपते वार ॥ छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १२ ॥ सामदामादि में निपुण दूत का पत्र दरखाना ॥ गाथा ॥ सामं दामं भेवं । वेदं गुनं विग्यं अंगाई ॥ जानं पनं सलीहं । ते पत्तं दूत दरसायं ॥ छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १३ ॥* कवि का सनीचरी दृष्टि के योग घर से भविष्य में बैर दोष होने का कथन करना ॥ साटक ॥ दिट्ठी दिष्ट सनीचरो वसथिनो, इंनोपि दुज्जं घरं । पावारं परिचार बैर गुरयं, जहोस्र चैक्षानयं ॥ १० पाठान्तर-कप्पाल । यहयो । गिरिजाई । गिरजाई । नो । बीभछो । तप । रतयो । मुखीं । तुंगयो । उरयो । गिरिजां । कहनाय । काम ॥ ११ पाठान्तर-श्रृंगार । कहनाय । काम । त्रियं । त्रिनेत्र । भय । बीभछ । नटवर्त्तनं । नटवत्तनं । अदभूत । अदभुत । नौ रस । नौ रस्स । रसितं ॥ १२ पाठान्तर-अस्तुति । नाहरराय । के । कें । संपत्ते ॥ १३ पाठान्तर-दानय । गुन । विग्य ॥ * यह रूपक सं० १६४७ और १८४८ की लिखी पुस्तकों में नहीं है ॥