भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

३३२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ४ भोगिनांरि समस्त संजुत कन्ना, भारय्यनो द्रिष्टयं । सावाजा बर वैर ग्रेच त्रिगुना, के के नगे राजयं ॥ कं० ॥ १६ ॥ छ० ॥ १४ ॥ कवि का कहना कि स्त्री के कारण से बैर दोष आगे रामादि बड़े बड़ों को हो चुका है ॥ कवित्त ॥ गयौ चन्द तारिका । पुच लज्जा बिन आन्यौ ॥ घेच वीर्य सम्भवै । वीर्य लब्भवै न पान्यौ ॥ बैर दोष श्रीराम । बैर दोषहू दुर्याधं ॥ बैर दोष नघुराई । बैर दोषह मुचकन्यं ॥ सा बैर दोष पण्डव बलिय । मात बचन ग्रह दोष सचि ॥ कूक दिनह समय सुन्दरि सचिय । संझ समय इह चरित जद्धि ॥ कं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १५ ॥ कामधेनु का चरित्र ॥ कवित्त ॥ कामधेन पच्छै प्रचण्ड । त्रिषभयं चह अधिकारिय ॥ एक एक उत्तरै । एक चढ्दै रस भारिय ॥ हसी सची दिषि निजर । दीन सराप सुधेनह ॥ हैां पसु तुअ सुमनुच्छ । होइ पञ्चाल ग्रेह मह ॥ लम्भी सुपच्छ जननी बचन । बंटि लई क्रम क्रम सुसुर ॥ तिह ग्रेह और जो सम्भवै । तौ बनहिं डेबर सबर ॥ कं० ॥ १८ ॥ ६० ॥ १६ ॥ प्रात समय जगते ही दूत का पत्र पढ़ना ॥ १४ पाठान्तर-हननोपि । दुजन । दुज्जन । घनं । परिहारं । पाथार । घेर । जदोह । चहुवांन । गिरनारि । भारथ ॥ १५ पाठान्तर-वीरज । लभवै । श्रीराम । दुर्जाधं । नघुराय । मचकत्यं । दिन । सुन्दर । रूह ॥ १६ पाठान्तर-कांधेनु । पक्कै । पक्खें । प्रछण्ड । वृषभ । चधिकारीय । उतरै' । चढै भारीय । साराय । हां । तूं । मनुष्य । भनुक्त । लभी । सुपक्क । बटि । जौर । हीबढै ॥