पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३३३ दूहा ॥ भयौ प्रात जगात द्वितिय, वंचि सुकग्गह पानि । आबू रा सळषान लिखि, बर गिर नारी बानि ॥ छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १७ ॥ उक्त पत्र में बीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहरराय के बल प्रताप का वर्णन ॥ कवित्त ॥ पूना कर पर वत्तह । कोरि दृह नीज सवायौ ॥ बीर रूप इक रुद्र । थांन हिंगुलाज बनायौ ॥ देवल एक अचम्भ । हेम जुत्तत्ति इक मंडी ॥ धूप दीप साषा* सूरङ्ग । धजा पत्ताकह ठण्डी ॥ दिषन सुथांन आचम्म वर । ज्यौ कवि मंची होइ कज ॥ कवि कहै चन्द वरदाइ बर । जौ चहुआन सुहोइ बज ॥ छं० ॥ २० ॥ रु० ॥ १८ ॥ कवित्त ॥ बर गिरनारि नरेस । सिंधु वही सुर तानं ॥ तेज तुज्झ तप तेज । बैर भंजै अरि पानं ॥ वर गुज्जर बैसाचि । जगत अड्डौ सुस्त्र बज ॥ तिन मुक्कत्ति दिय दूत । राज सम्भरिय षित्ति षल ॥ परिहार नाथ नाहर नृपति । दुह बळ्यो इक इक अग ॥ जानें कि जरा जुब्बन दुवन । सामन्तां संतोष भग ॥ छं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ १८ ॥ कवित्त ॥ दूत सामन्तन नाथ । बाथ बडवानल घल्लै ॥ सण्डल घल्लै नाथ । सार अग्गी षल जल्लै ॥ अकह कहांनी करन । सरन रषन असरन बज ॥ सुथिर अस्थिर करि थपन । अंग जग जन दारुन दज ॥ १७ पाठान्तर—पांनि । पांन । बांनि ॥ १८ पाठान्तर—परवत्तह । प्रबतह । घांन । घांनि । हिंगुंलाज । फुत्तरि । पुतलि । * अधिक पाठ है । सुरङ्गु । पताकह । दिपिन । सु यांन । ज्यो । कहैं । जो । चहुवांन । चहुआंन ॥ १८ पाठान्तर—बटी । पांनं । गुजर । अडौ । मुकलि । पित्त । पल । जाने । जुबन । सांमन्तां ॥