पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ६ भुन्न लोक सोक चर सुक्षित तन । पन अप्पन सोमेस सुच्च ॥ छत्त धने कलिमल मलन । तिहिन ओर पिक्खिय सुदुच्च ॥ छंदं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २० ॥ कवित्त ॥ चल्लत पंखि पिखि बाज । पिक्षि मृगराज मृगनि गन ॥ गोधन धरत गुवाल । हुंकि वै चल्लत वननि बन ॥ महु तजि चल्लत सुछाल । अन्य तरु साष लगन कहुँ ॥ बहल बिसद बिसाल । चलत र्वसि पवन गगन महुँ ॥ तिम नाहर राइ नरिन्द पिखि । समर सचिन सक्कहि सकज ॥ गिरि लङ्क सङ्घ सम गढ़ गरुअ । गिरद पारि किज्जै अजक ॥ छंदं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २१ ॥ पट्टन में चौलुक्य भीमदेव, आक पर जैत (सलख ?) पंवार, मेवाड में समरसिंह, दिल्ली में अनङ्गपाल जैसे बलवानों में मण्डोवर में नाहरराय के राज्य करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ उत पह्न भीमंग । ब्रह्म चालुक्क जोध जुच्च ॥ अब्बू जैत पवार । लोए लरि जांनि अचल धुच्च ॥ समर सिंघ मेवार । दण्ड देवार अजर जर ॥ दीली पत्ति अनंग । चरन अड्डौ सुलोच लरि ॥ परिहार नाह नाहर नृपति । इतन बीच अप बल रहै ॥ मण्डोवराइ मारू मरद । बर विरह बंकै बहै ॥ छंदं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ २२ ॥ पृथ्वीराज का आठ वर्ष की अवस्था में दिल्ली ननिहाल में आना, दिल्लीश अनंगपाल के आधीन राजओं का वर्णन ॥ २० पाठान्तर-छलन । जलन । कहांनी । रषन । अगं । जगंन । जगं । कलिमल कलि मलन । पिषिय । सुच्चय ॥ २१ पाठान्तर-पंख । वाज । पिषि । मृगनी । बनन बन । महुवाल । शाष । कहों । कहु । महु । नाहरराय । सकहि ॥ २२ पाठान्तर-चालुक । अबू । जांनि । दिल्लीषति । अड्ढो । बींच । बिरद । बहें ॥