पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ३३५ कवित्त ॥ वरष अठ्ठ प्रथिराज । गयौ मुसान दिल्लीं ग्रह ॥ राज करै अनँगेस । सेव मरुधरा करै सह ॥ मंडोवर नागौर । सिंधु जलवट सुपट्टै ॥ पेसौरां लाहोर । धरा कंगुर लगि कंठै ॥ कासी प्रयाग गढ देवगिर । इते सेव अग्या धरै ॥ सीमाडवियां संकै सुपछु । श्रित अनंग सेवा करै ॥ छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ २३ ॥ मंडोवर के नाहर राय का दिल्लीश्वर की भेंट को दिल्ली आना, पृथ्वीराज का रूप देखकर प्रसन्न होना और माला पहिरा कर कहना कि जब पृथ्वीराज सोलह वर्ष का होगा तब मैं अपनी कन्या इसको विवाह दूंगा ॥ कवित्त ॥ आयौ नाहर राइ । सेव आदरिय दिलेसर । दिष्पि कुँवर प्रथिराज । नूर अदभूत नरेसर ॥ अंबर माला इक्क । अंक पहिराइ कह्यौ इह ॥ मैं दिह्मी रूपसंगि । सबै उछाह कियौ ग्रह ॥ आनंद तेज राजा अनँग । प्रथीराज आयौ घरह ॥ दुइ अठ्ठ वरस जब बीति गय । व्याहूँ कह्यो देव गिरह ॥ छं० ॥ २६ ॥ रू० ॥ २४ ॥ नाहर राय का मत पलट जाना अर्थात् कन्या देना अस्वीकार करना ॥ २३ पाठान्तर—प्रथीराज । मूर । संध । बट । पुट्ठै । पैसोरा । कंठै । इतै । पह । क्षत ॥ २४ पाठान्तर—नाहरराय । आदरी । दिल्लेस्र । देखि । कुंअर । प्रथीराज । अदभुत्त । एक । पहिराय । दीधी । सवै । उछाह । कीयौ । सह । अभंग । अनंग । प्रथिराज । आयो । अठ । बीतिगा । ब्याहयुं । व्याहयु । देवगिर ॥ ११