भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

३३६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ८ दूहा ॥ बालपनै प्रथिराज नें, दिय कंचन वैमान ॥ मतौ फिरि दिन्नौ अक्रम, नाहर राइ विसान ॥ छं० ॥ २७ ॥ रु० ॥ २५ ॥ नाहर राय का उत्तर लिखना कि तुम्हारा कुल आदि हमारे योग्य नहीं है ॥ कवित्त ॥ लिखि कग्गद परिमांन । यांन अजमेर पठाइय ॥ दूत पंथ अविखंब । पास संभरि वै आइय ॥ चिंति सत्त आरंभ । सेन पारंभ विचारिय ॥ बाल वीर प्रथिराज । देइ नांची परिचारिय ॥ सग पन सुआदि सम वर नृपति । समर जुद्ध साधै समर कुल ढुंढ नाम दिज्जै नहीं । इह कलंक लग्गै सुघर ॥ छं० ॥ २८ ॥ रु० ॥ २६ ॥ अरिल्ल ॥ खेतरपाल कौं पूजैं कौंनं । जो परहरि गौ विंदह मौनं । परहरि सिव उमया गुन तचं । को मंडै चंडालो संचं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ २७ ॥ दूत का यह पत्र लाकर पृथ्वीराज के हाथ में देना ॥ दूहा ॥ लिखि कग्गद परिचार पर, विवरि विवर करि दूत ॥ लै दीनौ प्रथिराज कर, समी संझ सपहूंत्त ॥ छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ २८ ॥ पृथ्वीराज का क्रोध करना, सोमेश्वरदेव का समझाना ॥ कवित्त ॥ बढि अवाज* अजमेर । बंचि कग्गद चौरासिम ॥ परिचारह सब सेन । धर्म परिहरि बढ्यौ भ्रम ॥ २५ पाठान्तर-बालपनैं । पृथ्वीराजनैं । फिर । कीनौ । नाहर राय ॥ २६ पाठान्तर-परिमांन । यांन । चित्तिं । मतः । विचारैय । पृथ्वीराज । देत । नांही । परिहारीय । नृपति । जुध । साधैं । नांम । दिजै । नही । लगैं ॥ २७ पाठान्तर-क्षेत्रपालकूं । पूजै । गे। । मोंन ॥ २८ पाठान्तर-पृथ्वीराज । पहूत ॥