पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 351, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३४१ इक आइ पेस इक अश्व सोन । बज्वांन अंग चष रहत षोन ॥ सिक्कार नाम जहंतह तिक्कान । आरंभ जुद्ध सब रूपि विनान ॥ छं० ५८॥ इक सत्त उंट भरी जीन साल । तिन धरै अंग छिप्यै न काह ॥ भेदैन वज्र वर नीर धार । तिन धरैं अंग जे दृढ पगार ॥ छं० ॥ ६० ॥ सन्नाह महिम वरनी न जाइ । जिप्पनि कि देव दनुजनि उपाइ । जनु ब्रह्म होम कढि मंच जोर । कै इंदं अग्नि अप्पे अकोर ॥छं ॥६१॥ कै वरुण अप्पि पाताल ईस । कै पवन प्रसन परसाद दीस ॥ वाचिष्ट कढि कै कुंड होम । दीनी कि प्रसन व्है मात भौम ॥ छं०॥६२॥ आंस सिक्ख सध्य तीन नरेस । जितनह समर सज सचुदेस ॥ छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ पृथ्वीराज का प्रताप सुनकर नाहरराय का चौकन्ना होना ॥ दूहा ॥ सुनी पवर जब दूत मुख । चमक्यौ नाहरराव ॥ ए अप्पन गनियै नहीं । वैरी बिस हर घाव ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ अपने सरदारों से नाहर राय का कहना कि अब क्या करना चाहिए पहिले चौहानों से हम से और बात थी पर अब तो बिगड़ गई ॥ कवित्त ॥ सुक्षित सकल लिय बोलि । पुच्छि परिहार तिनहि मत ॥ चाहु आन पाषान । कहत आषेट जुद्ध बत ॥ तनक भनक सी कान । दूत इत्तह सुनि आए ॥ अप्प अचे तन रह्यौ । धरौ धर भूमि सदाए ॥
पाठान्तर-पेसि । बलवांन । सिकार । नांम । जहां । कांन । बिनांन ॥ ५८ ॥ सत । उंट । धरै । छिपै । भैदैन । घरैं ॥ ६० ॥ स्रनाह । महिम । जिपन । उपाय । ब्रम्हन । इंद्र । आपे ॥ ६१ ॥ कैं । प्रासाद । कढि । प्रसंन । भोम । भौंम ॥ ६२ ॥ सद्य । जितनह । शत्रु ॥ ६३ ॥ ३७ पाठान्तर-प्रवरि । चमक्यौँ । अपने । गिनियै । नही ॥