भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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३४२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १४ सोमेस हमह कछु द्वै नहीं । तिन सुचित्त माना लई ॥ तब तौ सनेह कछु और हौ । अब तौ कछु औरै भई ॥ छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥ सरदारों का कहना कि लड़ना चाहिए ॥ दूहा ॥ कहत सुभट परिहार के । दध्य चढी क्यों देइ ॥ सस्त्र मारि दल भंजि कैं । षग्ग धार धर लेइ ॥ छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ३९ ॥ नाहर राय का कहना कि आगे से बढ़कर एक बारगी उन पर चढ़ाई करना चाहिए नहीं तो जीत न होगी ॥ कवित्त ॥ सुनि मंडोवर राइ । कहन बलवंत सुभट सह ॥ द्रव्य उनह कर चह्यौ । कहहि सुतौ *सति वंत यह ॥ जाइ अचानक परै । बहुरि छेत्रै। नहिँ जैहै ॥ प्रथीराज उस सबल । मारि धरती सब लैहै ॥ इह सुनत सबन बैठी सुमन । सजन सेन बेगो कह्यौ ॥ चर चरन चरचि कैं वत्त इह । खो झत्ती मारग गह्यौ ॥ छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४० ॥ नाहर राय का सेना सजना ॥ दूहा ॥ सजी सेन मंडोवरह । नाहरराइ नरिंद ॥ संभरि संभरि राव नृप । उर उदोत आनंद ॥ छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४१ ॥ ३८ पाठान्तर-पुछि । चहुआन । पायांन । कांन । इतह । अचेतनह । सुदाए । हमह कम । नही । सुहित ॥ ३९ पाठान्तर-हथ । कै ॥ ४० पाठान्तर-मंडोवरराई । मंडोवरराय । सुनद । कह हि सुतौ सति वत्त इह । *अधिक पाठ है । परौं । नहिं । जैहैं । डंस । धरती लैहैं । सबल । वेगो । वल । झती ॥ ४१ पाठान्तर-नाहरराय । संभरि वार । उद्योत । अनंद ॥