पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराज रासो । ३४३ पृथ्वीराज की सेना की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ सदस लेन संसारी । नरेसु मध्य सन टारि पंच सम ॥ वीर सिंगार सुभंत । कंत जनु रत्त बाम सम ॥ दन्तउभय नंचारु । सिलह सज्जी चहु आनं ॥ चंद देखि मन मगन । कविन तिन करै बषानं ॥ पंचमी सोम रितु राज गत । सूर तेज जाजुलित धुअ ॥ कर तार धय्य कित्ती कही । वज़ि निसांन चहुआन धुअ ॥ छं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४२ ॥ पृथ्वीराज का आगे से बढ़कर लड़ने के लिये जोवनराय को आज्ञा देना ॥ तवै सुजोवन राई । सूर साह्रौ चहुवानं ॥ तुम गुज्जर बैषंड । गाम सुरधर अगिवानं ॥ पंथ पंथ परवान । धाइ अगिवानी किज्जै ॥ सगा सपन जंपियै । छमनि आरोचि सुलिज्जै ॥ वामान पंथ अंधी प्रकृति । बिन दिट्ठे दिट्ठे न कछु ॥ वन पंन अहु परवत रहे । भेद बिना जानहि न कछु ॥ छं० ॥ ७० ॥ रु० ० ४३ ॥ जोवनराय का उत्तर दे कहना कि नाहरराय का पथ बांधा सो वह रणभूमि को तिरछी छोड़ कहीं चला गया ॥ तब्ब सुजोबन राइ । बत्त जंपै चहुवानं ॥ अहु पंन परबत्त । सत्त गुज्जर धर मानं ॥ लोहाना आजान । पंथ बंध्यौ पालक्की ॥ नाहर राइ नरिंद । गयौ तिरछीं भुअ मुक्की ॥ ४२ पाठान्तर-संभारि । * अधिक पाठ है । मधि । सिंगार । सजी । चहुआनं । पेषि । षषानं । रिति । हथ्थ । किती । निसांन । चहुआन ॥ ४३ पाठान्तर-तवै । राय राव । चहुवानं । चहुआनं । गुजर । गांम । मुरधुर । अगिवांनं । परवांन । अगिवांनी । कीजै । लिजै । वामांन । दिट्ठै । हिट्ठै । अहु । अद्दु । प्रवत । जानै १२