भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

३४६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १८ दूहा ॥ तीन पनच धुनचीं करन, बडे कटन तंडीर ॥ सगुन बिना पग ना धरै, विकट बंन झंडीर ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥५२॥ पर्वतराय कैसे घाटी रोक कर बैठा है ॥ कवित्त ॥ मडोवर धर बाज । राज रषन परिचारन ॥ स्वामित सकं वज्रंग । जंग जिन अंग न हारन ॥ देत सेवासनि भेजि । मारि घर पर पसु खावै ॥ देषत कै राजांन । बिरदवा नैन चलावै ॥ बैठे सु ओट रुंषन उपल । करि तरकस उंधे धरनि ॥ देषंत बघ चहुवांन की । भरै जांनि बिसहर बरनि ॥ छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ५३ ॥ घाटी रुकने का समाचार पृथ्वीराज को मिलना ॥ दूहा ॥ छढी षबर प्रथिराज तिन । मीनां सरह अमान ॥ पकरि लोह पब्बय गह्यो । सबै को अगौ जान ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥ क्रोध करके पृथ्वीराज का पर्वतराय से लड़ने को कान्ह चौहान को भेजना ॥ कवित्त ॥ सुनि कुप्पिय प्रथिराज । जानि पुच्छिय सुअप्प मन्त्रि ॥ मनु मृगराज मृगीन । जोर क्रुद्धिय दिषिय बत्रि ॥ आछ ग्रछन जनु जीव । देषि तुद्दिय सुमीन कछ ॥ समर समुद्द जल पियन । जांनि घट जन्म क्रोध मछ ॥ षिजि कछी कान्ह चहुवांन सहु । रंक आइ अड्डे फिरे ॥ सिर नाइ धावू नरनाह तब । प्रब्बत सम प्रब्बत भिरे ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ५५ ॥ ५२ पाठान्तर-धुनहीं । षट्ठे । कठन ॥ ५३ पाठान्तर-बजरंग । जंग किन अगन हारन । दैत । मैवासन । मेवासन । के । राजांन । बिरदवां नेन । रुंष ऊटन । औंधे । चहुवांन ! भरे । जांनि ॥ ५४ पाठान्तर-पवरि । प्रथीराज । मीनां । अमांन । गृह्यौ । आगैं । अगै । जांन ॥ ५५ पाठान्तर-प्रथीराज । जांनि । पुंछिय । मनोँ । क्रुधिय कि दिषि बल । जांनि । चहुआन । आंनि । परबत । भिरै ॥