पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय १६] पृथ्वीराजरासो । ४४० कान्ह का पर्वत से युद्ध और उसमें पर्वतराव का मारा जाना ॥ छंद भुजंगी ॥ मंडे सेर सीना ग्रछ्यौ चोरि घाटा । मिले आइ कन्हं मनौं लौन आटा ॥ मंडे झुंड वृष्णं कहूं दंत छोटं । ढिले ना सुमेरं मंडे जानि कोटं ॥ छं० ॥ ८३ ॥ भई तीर मारं सरोसं सवेगं । तदै ताद्दि पारै सबिद्धं अच्छेगं ॥ सद्भावज्जघातं उतप्पात मंज्यौ । करे हूह हाकं बरं बेग डंड्यौ ॥ छं०॥८४॥ जुटे जुद्ध अनवद्ध करिकुद्ध ठाढे । करैं हथ्य वाहं पयं संडि गाढे ॥ गिरै बान लग्गै बियं इत्त उत्तं । महामंच विद्या गुरु द्रोन चित्तं। छं ॥८५॥ भई बान छाया न सूझै मरीचं । मिले लोह लकाच तत्ते तरीचं ॥ गिरै अश्व असवार लोहं जहीरं । परै जानि डंडूर वृष्पं गहीरं ॥छं०८६॥ द्ययं कुंडि नर्नाह हुए उनारै । हहंकार बज्जै सहोमं पुतारै ॥ परै अश्व घातं सरोसं सरीरं । बकै केय वक्कं करैं के अरीरं ॥ छं०॥८७ ॥ सरं जान भाखं उडै लोच अग्गी । जरै पंथ पंषी गिरैं स्वर्ग मग्गी ॥ भरै मुट्ठि कन्हं सरं मार बग्गं । निकस्तैं सुविद्धे हुअ पग्ग उग्गं ॥छं०॥८८॥ खगै गुज्ज सीसं कथैं उक्ति कोगी । पछारंत तूंबा सनौं षीजि जोगी ॥ वहै अस्सि त्रिद्धघात रोसं प्रत्तारं । मनौं निक्कसै सद्यनं तंततारं॥ छं० ८९॥ लगै संग हृत्ती फुटै पुट्ठि पच्छी । ककंधं कछारं कटैं जार मच्छी ॥ जितं त्ति जठंत किंकं रकत्तं । फिरैं मह भोतेयानक वकत्तं ॥छं०॥९० ॥ नचै भूत बेताल षेतं भयानकं । रसं वीर रस्से इस्से निर्हयानं ॥ मिल्यौ भुष्प कन्हं परब्बत वीरं । हन्यौ अस्सि घातं धुक्यौ ता सरीरं ॥९१॥ जह्यौ कंध कन्हं असीघात धीरं । करी कहि संना षरी चग्ग चीरं ॥ पद्यौ झुम्झि प्रब्बत राबत्त भेरं । गज्र्यौ नाहरं गाज नाहर्सवेरं ॥ छं० ॥ ९२ ॥ रू० ॥ ५६ ॥ ५६ पाठान्तर-मंडे । मोनां । घांटा । मिलैं । कंव्हं । मनों । लोन । लौंन । मंड़े । षप्पै । उटं । ढिले । नां । मंड़े ॥ ८३ ॥ सबेगं । हूक्क हाकं ॥ ८४ ॥ करै । हथ्थ । गिरे । बांन । लगैं । बोयं । इत । उतं । वित्तं ॥ ८५ ॥ बांन । लकबाछ् । गिरैं । परें । जांनि । वृपं ॥ ८६ ॥ नरनाह । हकहाक । बज्जे । महं में । परै । सरोस । बकें । बंकं । षकं । करें ॥ ८७ ॥ जरै । गिरें । भरें ।