पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
सातवां समय १६] पृथ्वीराजरासो । ४४० कान्ह का पर्वत से युद्ध और उसमें पर्वतराव का मारा जाना ॥ छंद भुजंगी ॥ मंडे सेर सीना ग्रछ्यौ चोरि घाटा । मिले आइ कन्हं मनौं लौन आटा ॥ मंडे झुंड वृष्णं कहूं दंत छोटं । ढिले ना सुमेरं मंडे जानि कोटं ॥ छं० ॥ ८३ ॥ भई तीर मारं सरोसं सवेगं । तदै ताद्दि पारै सबिद्धं अच्छेगं ॥ सद्भावज्जघातं उतप्पात मंज्यौ । करे हूह हाकं बरं बेग डंड्यौ ॥ छं०॥८४॥ जुटे जुद्ध अनवद्ध करिकुद्ध ठाढे । करैं हथ्य वाहं पयं संडि गाढे ॥ गिरै बान लग्गै बियं इत्त उत्तं । महामंच विद्या गुरु द्रोन चित्तं। छं ॥८५॥ भई बान छाया न सूझै मरीचं । मिले लोह लकाच तत्ते तरीचं ॥ गिरै अश्व असवार लोहं जहीरं । परै जानि डंडूर वृष्पं गहीरं ॥छं०८६॥ द्ययं कुंडि नर्नाह हुए उनारै । हहंकार बज्जै सहोमं पुतारै ॥ परै अश्व घातं सरोसं सरीरं । बकै केय वक्कं करैं के अरीरं ॥ छं०॥८७ ॥ सरं जान भाखं उडै लोच अग्गी । जरै पंथ पंषी गिरैं स्वर्ग मग्गी ॥ भरै मुट्ठि कन्हं सरं मार बग्गं । निकस्तैं सुविद्धे हुअ पग्ग उग्गं ॥छं०॥८८॥ खगै गुज्ज सीसं कथैं उक्ति कोगी । पछारंत तूंबा सनौं षीजि जोगी ॥ वहै अस्सि त्रिद्धघात रोसं प्रत्तारं । मनौं निक्कसै सद्यनं तंततारं॥ छं० ८९॥ लगै संग हृत्ती फुटै पुट्ठि पच्छी । ककंधं कछारं कटैं जार मच्छी ॥ जितं त्ति जठंत किंकं रकत्तं । फिरैं मह भोतेयानक वकत्तं ॥छं०॥९० ॥ नचै भूत बेताल षेतं भयानकं । रसं वीर रस्से इस्से निर्हयानं ॥ मिल्यौ भुष्प कन्हं परब्बत वीरं । हन्यौ अस्सि घातं धुक्यौ ता सरीरं ॥९१॥ जह्यौ कंध कन्हं असीघात धीरं । करी कहि संना षरी चग्ग चीरं ॥ पद्यौ झुम्झि प्रब्बत राबत्त भेरं । गज्र्यौ नाहरं गाज नाहर्सवेरं ॥ छं० ॥ ९२ ॥ रू० ॥ ५६ ॥ ५६ पाठान्तर-मंडे । मोनां । घांटा । मिलैं । कंव्हं । मनों । लोन । लौंन । मंड़े । षप्पै । उटं । ढिले । नां । मंड़े ॥ ८३ ॥ सबेगं । हूक्क हाकं ॥ ८४ ॥ करै । हथ्थ । गिरे । बांन । लगैं । बोयं । इत । उतं । वित्तं ॥ ८५ ॥ बांन । लकबाछ् । गिरैं । परें । जांनि । वृपं ॥ ८६ ॥ नरनाह । हकहाक । बज्जे । महं में । परै । सरोस । बकें । बंकं । षकं । करें ॥ ८७ ॥ जरै । गिरें । भरें ।
३४८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २० पर्वत के मारे जाने पर नाहरराय का स्वयं टूट पड़ना ॥ कवित्त ॥ परत धरनि परबत्त । आइ हुंकिक्य नाहर रन ॥ बलवड्ढे सह मेर । जानि ह्नुमान लंक बन ॥ इक्क गिरत घन थाप । इक्क बथ्थनि पक्कारिय ॥ बब्बर रूप सम भूप । रूप अनभूत संचारिय ॥ मानिक्क बंस आयौ उतह । दूत नाहर गल गज्जैा ॥ परबत्त पर्यौ पडु पिछिकै । सिंधू बञ्जनं बज्जया ॥ छं ॥ ९३ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ पृथिराज का भी चढ़ चलना । छंद पद्धरी ॥ चढ चल्यौ राज पृथिराज ताम । साधन सुसेन वर वरन वाम ॥ दुल्लहै भयो खोमेस पुत्त । वनिता विवाह मन कंक वृत्त ॥ ९४ ॥ * बज्जिचि निसान दस दिस गुरान । आषाढ अग्ग ज्यौं मेघ थान ॥ रथ वाजि करी पयदत्त पुल्लेन । सज्यौ नरिंद चतुरंग षेन ॥ ९५ ॥* मुक्की सुभुम्मि अजमेर राज । यंतौ सुजान् पहन समाज ॥ धज्जी सुहागि सिंधू निसान । भयभीत भेष भय दस दिसान ॥९६॥ बज्जिय सुभैरि भय शंकरीस । गज गजे गाच घय छठ छींस ॥ गिरनार देस अरु सिंधु बह । गज्जै सुगाज सजि थह यह ॥ ९७॥ ढलकंत ढाल बैरष रंग । सोभंत विपन रिति राज संग ॥ मिलि आय पंथ नाहर नरिंद । वीराधि बीर बड्ढे सुदंद ॥ ९८ ॥ छह्वारि भह षेना सवान । सामंत सूर करि लोह्र पांन ॥ कन्दा नरिंद आजान बाह्र । संगरी राव स्वामित्त राह्र ॥ छं० ॥ ९९ ॥ भूठि । निकसैं । बुद्धी । हुच्चै । उगं । डंगं ॥ ८८ ॥ लगें । गुर्ज । गुरंज । शीसं । कहै । पछां- रंत । तुंबां । मनो॑ । वहैं अश्व निर्घात । वहै । विघात । मनो॑ । निकसं । निकसै । सर्घनं ॥ ८९ ॥ लगें । संगि । छती । फुट्टै । पुठि । मली । कहारं । कठैं । मुक्की । तित । उठंत । । छिकं । रकतं । फिरें । फिरै । भट । वकतं ॥ ९० ॥ नच्चै । रसैं । मुष । सुपरजत । असि ॥ ९१ ॥ फंन्द । असि । कटि । संनाह । परि । चष । भुझि । परवत्त । रावत्त । नाहर । संवेरं ॥ ९२ ॥ ५७ पाठान्तर-परबत । आय । हकिक्य । बट्टे । बढे । जांनि । हनुमांन । रक । घन घाय । इक । बथन । पक्कारीय । पक्कारिय । सम रूप । संचारिय । संवारीय । मानिकं । मानिक्क । गज्या । परबत्त । पिछि । कै । सिधू । बजन । बजया ॥
सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३४६ संभारि बीर चालुक्क भूप । उपज्यौ ब्रह्म कुंडह अनूप अतताइ तुरंग तेरह सुपंड । षिजि रह्यौ रोपि रन रोद्धि झुंड ॥ ॥ कूं० ॥ १०० ॥ तिन ठाम आइ नाहर सुघरि । वाहंत हथ्थ जनु करिय केरि ॥ ॥ छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ इधर पृथ्वीराज इधर नाहरराय का सन्मुख युद्ध ॥ कवित्त ॥ उत प्रथिराज नरिंद । इत सुपरिचार प्रबख रन ॥ दुअन सेन असि कढ्ढि । करन कऋषंत समय जनु ॥ दुअन अङ्ग संनाह दुअन नष चष उघारें ॥ दुअन इष्ट आरंभ । दुअनि दुअ हथ्थ दुधारें ॥ दुअ सुम्भि अङ्ग दुअ देव जनु* । दुअन धार दुअ तुक बढ़िय ॥ संनाह कहि कही सुनूह । तस उपम चन्दह कहिय ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु० ॥ ५९ ॥ कवित्त ॥ दुअन हथ्थ दुअ भूप । रूप अदभूत रेष बढ़ि ॥ इन्द्र सिलह प्रथिराज । चंद्र परिचार तेज गढि ॥ दुअ अभंग संनाह । दुअन देवन आधारन ॥ दुअन तेज तन अंस । हंस दुअ हंस समाधन ॥ अवतार भूत दुअ देव सम । दुअन चिन्ह उत्तम करिय ॥ परभास षेत परब्रह्म दुति† । भृगु लंङ्कन जनु धरि धरिय ॥ छं० ॥ १०३ ॥ रू० ॥ ६० ॥ ५८ पाठान्तर-* ये ९४ । ९५ और आधा ९६ छंद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ प्रथीराज । तांम । वांम । दुल्लह । पुत ॥ ९४ ॥ ज्यौं । थांन । पुलेन । सज्यों ॥ ९५ ॥ मतौ । बजी । लाग । निसांन । दिसांन ॥ ९६ ॥ वजिग । गजैं सुराज हय हठ हौंस । गिरनारि । दूट । गर्जे । घट घट ॥ ९७ ॥ बैरष । बढे ॥ ९८ ॥ हहकार । भट । सबांन । आजानवाह । स्वामित ॥ ९९ ॥ चालूक्र । ऊपज्यो । तुरंग । रोहि ॥ रिन रोपि ॥ १०० ॥ ठांम । हथ ॥ १०१ ॥ ५९ पाठान्तर-प्रथीराज । कढी । सनाह । चप । हथ । दुधारें । सुभि । कटि । कटी । *उपम ॥ ६० पाठान्तर-हथ । प्रथीराज । रहि । उत्तिम । द्युति । भृगु । लकिन ॥ * एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअन इष्ट आरंभ" से "दुय देष जनु" तक नहीं हैं। परंतु सं. १६४७ की में हैं † एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअ देव सम" से "ब्रह्म दुति" तक नही है। परंतु सं. १६४७ की में हैं ॥
३५० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २२ उसमें पृथ्वीराज का नाहरराय के घोड़े को मार डालना ॥ दूहा ॥ फुनि पृथिराज कुमार नैं, हय हन्यौ परिहार ॥ कंध दुअं कटि वग सहित, झुक्यौ धरनि असिधार ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रू० ॥ ६१ ॥ दूहा ॥ झुकत धरनि नाहर तुरिय, झपक्यौ बंध कर्नंक ॥ तेक तोकि तक्यौ तुरी, बचि असि कंध छनंक ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ ६२ ॥ दूहा ॥ दुअ कोटल दुअ नृपति के, किन्नें घाजुर आनि ॥ दुअन बीच दुअ सुभट घट, अठ भएं चट्टानि ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ६३ ॥ रनबीर का सन्मुख हो पृथ्वीराज से जुद्ध करना ॥ कवित्त ॥ बर पावस रनबीर । दुतिय पावस सम सज्जौ ॥ धूम जोति अरु सलिल । मरुत प्राकारनं बज्जौ ॥ सज्जि सेन चतुरंग । बरन बह्ल रंग धारिय ॥ स्याम सेत अरु पीत । रत्त धज मत्त विचारिय ॥ उन्नयौ धार धारग्धनी । खरन तिरच्छौ बुट्ठिबर ॥ बिज्जुुलि झमंकि पग पंत्तिकर । पिवौ सेन अरिजुध्य पर ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ६४ ॥ मोहन परिहार और पवार का सम्मुख हो लड़ना ॥ दूहा ॥ उत मोहन परिहार रन । मेर समान अमान ॥ द्वै द्वै असि कटि बिकट बनि । द्वै धनु द्वै द्वै बान ॥ छं ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ६५ ॥ ६१ पाठान्तर-प्रथीराज । कुम्मारनैं । है । हंत्यो । कन्ह कट्टि हुअ ॥ ६२ पाठान्तर-तुरी । तोकि ॥ ६३ पाठान्तर-दुतीय । सज्यौ । मूरत । प्रककारन । सजि । बहूर । धारीय । स्याम । रत विचारोय । उनयौ । तिरछौ । कुट्टि पर । बुष्टि । बिजुलि । झमंक जुथ ॥ ६५ पाठान्तर-दोहरा । समांन अमांन । द्वैद्वै धनु द्वैवांन ॥
६. शहाबुद्दीन गोरी आक्रमण, शब्दभेदी बाण व उपसंहार
सातवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३५१ कवित्त ॥ दंत लोचन परिछार । इत सुअवल इंदाह, इय ॥ दिष्ट दिष्ट अंकुरिय । संझ जुग सात दिष्ट घर ॥ लोचन कोपि दारार । सीस पांवार लुझारिय ॥ टोप कहि फटि मुंड । झपटि पांवार निझारिय ॥ फटि सुंड तुंड धर कहि झाटि । लह विफार अफार झट ॥ * ढार वत्त तत्त बिदार क्रि तुरत । जनुकि कशारिय पटुपट ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ६६ ॥ चामंड का युद्ध ॥ कवित्त ॥ चंड रूप चामंड । दनत बलवन्त प्रतापन ॥ हन्यौ संग दुअ अंग । निकसि दुअ अंगुल सापन ॥ उभै संग चलि धाए । मध्य गहि हत्थ दु हुय्यन ॥ उडि भेजी सुअकास । कुहि पिचकार दद्धिकन ॥ परताप भग्गि परि प्रथ्वि पर । लोक तीन कीरति कथिय ॥ द्रव्यान पान निकसी सुरवि । जोति जाइ जोतिन मिलिय ॥ छं० ॥ ११० ॥ रु० ॥ ६७ ॥ कवित्त ॥ मिले पौंन सौं पौंन । मिले पानी सौं पानी ॥ मिले तेज सौं तेज । मिले सूनै सूनानी ॥ मिलै प्रथी सौं प्रथी । मिले चरि लौं चरि बेत्ता ॥ मिले हुतासन होत । होम होमै जो होता ॥ जल छत जोत जल भिरत हरि । पय सें जिम पय मिलि सुपय ॥ मिमि मरत दुरत जेइं झरत रनि । सुमिलिय प्रताप सु आप स्वय ॥ छं० ॥ १११ ॥ रु० ॥ ६८ ॥ ६६ पाठान्तर-पांवार । झारीय । फटि । तिझारीय । “ * फटि मुंड तुंड दुअ पंड हुअ । अधर फट्टिय बर पग झट ।” सं० १६४७ की में यह पाठ है । वत । तत । बिहार कि । कशा- रीय । पटु ॥ ६७ पाठान्तर-आय । मथ । हथ । दुह्यन । दधि । प्रताप । पर । पृथ्वी । लोकं तन । द्रव्यांन । पांन । जाय ॥ ६८ पाठान्तर-पोंन । सो । पोंन । पानी । सो पानी । सुने सुनांनी । पृथी । सो । पृथी । छता । होमे । मिलत हर । हुरत । जेहूँ । रिन ॥ ४३
३५२ 'पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २४ कवित्त ॥ संस छड्डु रद गूढ़ । अंत बर बाज गज्ज नर ॥ भय भूअत्त असत्त । चढिय जुग्गिन तिन उप्पर ॥ डूक्क दंत गज गिद्धि । उतरि लै अंत अलुफ्भिय ॥ डूक्क कोद जुगिनीय । करन चैंचत सौं झुक्किय ॥ तिद्दि दिष्षचंद कविराज तत । अति उल्हास ओपम बढ़ि ॥ उडवत्त चंग सुचंग अँग । राज कुमारि अहानि चढ़ि ॥ छं० ॥ ११२ ॥ छ० ॥ ६६ ॥ दूहा ॥ धषलंगी धवली दिसा धवल तन चहुवान ॥ धवल दीछ संमुछ खख्यौ । जस धवल तन आनि ॥ छं० ॥ ११३ ॥ रू० ॥ ७० ॥ स्वामि रक्त रत्ते समुद्द । रत्ते नैन कहर ॥ रन रत्ते द्वव दाह सम । गुंजत गल्ह गहर ॥ छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ७१ ॥ नाहर ? से नाहरराय का लड़ना ॥ कुंडलिया ॥ नाहर सौं संमुछ खस्यौ । नाहर राहू नरिंद ॥ मंडोवर मारू बली । धनुवर भूपति दंद ॥ धनुवर भूपति दंद । सेन चहुआन ढंढोरी ॥ सुर असुरन करि मेर । मथन दरिया हिल्लोरी ॥ हथ हथ्थिन घन झंकि । धीर झुझ्यौ छकि छाचर ॥ मरदन सौं मिलि मरद । मरद बुल्ह्यौ मुख नाहर ॥ छं० ॥ ११५ ॥ रू० ॥ ७२ ॥ ६६ पाठान्तर—वाजि । गज । भृत । असत । जुगिना । उपर । डक्क । उतर । अलुभिय । इक्क । जोगिनीय । चैंचत । सों । झुकिय । तिहिं । दिषि । तित । उपम । उडवत । चांग । कुंमारि । अट्टानि ॥ ७० पाठान्तर—तन । तंन । चहुवांन । आंनि ॥ ७१ पाठान्तर—स्वामिरत । रते । रत्ते । नैन । दते ॥ ७२ · पाठान्तर—सों । नाहरराय । धनिवर । चहुआन । ठंढोरी । ठठोरी । टंटोरी । असुरनु । दरीया । हिलोरो । हथिन । सों ॥
सातवां समय ९५ ] पृथ्वीराजरासो । ३५३ बलराय का खेत में मँडना ॥ कवित्त ॥ हथ रच्यौ थिर सुथिर । षेत संज्यौ वलरायं ॥ सार सार अप्पार । धार लग्गा धर चायं ॥ उठिय अग्ग पगधार । धपी द्रुगा धर लोइय ॥ धक्क छक्क उच्चार । सार अप्पं दन्न मोइय ॥ निध्धात घात भरकर करचि । नभ निसान तिन सह भरि ॥ सब सूर सुरंगीय कंठ वल । सुसर कढि असि वर पसरि ॥ छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ७३ ॥ घोर युद्ध वर्णन ॥ इंदू विराज ॥ कढी * तेग तत्तं । मनौ मल्ल घत्तं ॥ लगे लोह लग्गं । पगं पग्ग वग्गं ॥ छं० ॥ ११७ ॥ दुअं वाह वाहं । गजै गज्ज ढाहं ॥ जुटे इत्त उत्तं । मनौ संस चित्तं ॥ छं० ॥ ११८ ॥ धुकेँ धींग धक्कैँ । छकै सार छक्कैँ ॥ भिरैं भूमि रुंडं । वकँ बैन मुंडं ॥ छं० ॥ ११९ ॥ तुरैं तूट वाहँ । दतैं दंत माहैँ ॥ डूकं पाइ कूदैं । टिकैं तेक रुंदे ॥ छं० ॥ १२० ॥ चहैं बाधुआनं । तडित्तं कमानं ॥ रसं बीर रस्से । बदै लोह घस्से ॥ छं० ॥ १२१ ॥ गजैं गैन देवी । अभूतं सुएवी ॥ नचै भूति भूमी । जकैं देषि झूमी ॥ छं० १२२ ॥ षिजै खेत पाखं । विहंडै कपाखं ॥ रचै रुंड माखं । स्रवै सोन लाखं ॥ छं० ॥ १२३ ॥ चवट्टी चिकारै । फिकीयं फिकारै ॥ ७३ पाठान्तर-थह । अपार । लगा । दृगा । धक हक । उचार । अयं । निघात भह । निसान । शब्द । सुरंगीय । कढि ॥
३५४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २६ गमं गिद्ध गह्रैं । पखं पूचि चहैं ॥ छं० ॥ १२४ ॥ भिरैं भंति भारी । अभूतं सुरारी ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रु० ॥ ७४ ॥ दूहा ॥ परत भिरत तुह्त सुकर । दरत निवत्त सुछद्य । अप्पानौ बल छय्यनह । कां संगे बल तथ्य ॥ छं० ॥ १२६ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ नाचर कर नंन्हा सुपय । भय भारथ्य उपाउ । जासु जहां जो जबरै । तिहि बल रोच सदाउ ॥ छं० ॥ १२७ ॥ रु० ॥ ७६ ॥ गाथा ॥ कायर सुप्प प्रमानं । बर कंमोदयं मोदयं सुप्पं । सत सित पच प्रमानं । उधारियं बीर वृंदायं ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७७ ॥ छंद निसंगी ॥ झुंकारे सूरं, वज्जत तूरं, नच्चत हूरं, सुर सुरयं । दय छंदिय राजं, तेजय पाजं, खरे सुसाजं, झुर सुरयं ॥ चलि चालं बंधी, तारा संधी, छसै सुनंदी, है तारी । तुरसी रस अंजरि, तव नव पंजरि, तन घन पंजरि, वैमारुं ॥ १२९ ॥ घन केसर रंगं, अंबनि चांगं, नच्चत जंगं, अचि क्वालं । जंपे चरि गंगं, गुन अनभंगं, चरमन अंगं, असि झारे ॥ दूह्नां बबक्कारै, दुनां न चारैं, छोच करारै, गुन भारे । केसरि रंग रोारं, असिवर छोरं, औ तन कोरं, घटि क्वालं ॥ १३०॥ सिर तुष्टि भ्रमाजं उमया जानं, छूअ समानं, सुर दाळं ॥ ७४ पाठान्तर--नेग । तते । मनों । दुहुं । गजे । गज । इत उत्त । मने । चित्ते । धुकें । धगि । धके । हकें । छके । वैन । तुटैं । लुटें । छूटि बाहैं । दंतैं । साहैं । पाय । रुद्धैं । चाहुवानं । रसे । बहैं । हसे । गैन । भूमि भूमी । जकैं । रचै । रुड । अव्रै । चवटी । चवट्टी । फ़कारी । फिकियं । फिकारैं । गोमं । गिहुं । गह्रैं । चुट्टै । चिदैं । सारी । अभूंतं ॥ * सं० १६४७ की लिखी पुस्तक में इस छंद का शुद्ध नाम विराज है और इतर में रसावला है । यह दो लघुगु और रसा- वला दो गुलगु का होता है । ७५ पाठान्तर-चुटत । हथ । अप्पंनी हथ । मगौ । मगै । तथ ॥ ७६ पाठान्तर-भारथ । तिहिं ॥ ७७ पाठान्तर-मुप । प्रमांनं । कमोद । कंमोद । रुषं । प्रमांनं । उधारियं । वृंदारूं ॥
सातवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । ३५५
छिल्लोरे पग्गं, अरि घट जग्गं, करिन अनभग्गं, जुधमोरं । परिच्छार सु आपं, अरि डर ढापं, रुपि रन धापं, पग छोरं ॥ चानुकक्क सुभानं, जुद्ध समानं, अरि हरि मानं, गुमांनं । कुं० ॥१३१॥ पर मध्य पबारं, असि बहु झारं, अच्छरि तारं, सो रानं ॥ कूरभ पग जग्गी, दस काम भग्गी, फिर रन लग्गी, परिच्छारं ॥ दाछिम पग पुल्लं, बीर सु वुल्लं, नच मन डुल्लं, भर सारं ॥ कन्द कुंमारं, रन परि भारं, सार सुमारं, नच छल्लँ ॥ कुं० ॥१३२॥ आवध नच फुट्टै, गुरजनि छुट्ठै, सीसय फुट्टै, कर चल्लं ॥ रन जैन सरीसं, तुष्टिय सीसं, लगि घन रीसं, परि वध्यं ॥ रन लुथ्यि अलुथ्यं, गुन कवि कथ्यं, अचरिज सथ्यं, रवि रथ्यं ॥ कुं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
छंद भुजंगी ॥ पक्कायौ जुसूरं विराजंत बीरं । स्वयं कंठ आभूषनं छंद नीरं ॥ पया खेस मत्ता चवं पंच अच्छी । कितौ छंद नामं बिराजै सु लच्छी छंद ॥१३४॥ नवं नेह नारी लछी देह दूनौ । करी सूर नांची विराजंत सूनौ ॥ इयं कूंडि राजं लरे सूर तेजं । मनौं जुद्ध आकूत भारत्थ एजं ॥ कुं० ॥ १३५ ॥ चत्तै चाल बंधे तनं मंड आसं । कहै चंद कच्ची तिनं जुद्ध भासं ॥ कुं० ॥ १३६ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
गाथा ॥ हंकारे विप सेनं । बजे बज्जाईं पंच सद्दायं ॥ सद्दे नव रँडा रंगं । भगं कन्ह चितयं बलयं ॥ कुं० ॥ १३७ ॥ रु० ॥ ८० ॥
७८ पाठान्तर—हकारे । घजस । नंचत ॥ १२६ ॥ केसरि । नचल । गंग । सिरमन । खबकारै ॥ १३० ॥ त्रुटि । प्रमानं । हिल्लोरे । पगं । जगं । करि अनभग्गं । चालुक । गुमान । गुमांनं ॥ १३१ ॥ अच्छरि । सोनारनं । कूरंभ । कूरभं । क्रूरं । भगी । फिरि । लगी । पुलं । वुलं । डुलं । झाल भारं सिरं । कुमारं । हलं ॥ १३२ ॥ फुट्दै । विछुट्दै । फुट्टै । चलं । शीसं । वध । लुथ उ लुथ । कथं । सथं । रथं ॥ १३३ ॥ ७९ पाठान्तर—सौ सु । पटं । अछी । किनौ । नांमं । लछी ॥ १३४ ॥ लरैं । मनौ । भारथ ॥ १३५ ॥ कहैं । कवी ॥ १३६ ॥ ८० पाठान्तर—हकारे । बीय । बजाइ । सद्दाई । सदे । रंगं रंगं । रंग रंग । अगं ॥
३५६ पृथ्वीराजरासो। [ सातवां समय २८ दूहा ॥ उत मंडोवर वीर कौं, इत संभरि वै राव ॥ दुअ लग्गा अस रार जुध, सुकवि चंद करि कावं ॥ छं० ॥ १३८ ॥ रू० ॥ ८१ ॥ छंद भुजंगी ॥ सलुथ्यं सलुथ्यं अलुथ्यं तिलुथ्यं । इयानं उषानं समानं पलत्थं ॥ हयगं रथंगं धरं धार तुहैं । धरं धार धीरं मघा वीर लुहै ॥ छं० ॥ १३६ ॥ छबकै रुधिंगा प्रवाहं सिरज्जं । धरं घाम चापं रनं केन रज्जं । भनकंतं भेरी चिक्कारैं सुछथ्यी । नचैं रंग भैरूं ततय्ये ततय्यी ॥ छं० ॥ १४० ॥ प्रचारं सुदंती सुअंती अलुभकं । अलुझैं सुदंती उड़ैं किंक झुलकं ॥ मनं झारते जान हेभं हयनं । परज्वाल तुहैं तनंजा विननं ॥ छं ॥ १४१ ॥ रू० ॥ ८२ ॥ लोहाना आजानु बाहु के युद्ध का वर्णन ॥ कवित्त ॥ लोहानौ आजानं । बांह लंबी पसारै ॥ लंबी बांच पसारि । तेग खंबी उब्भारै ॥ उब्भारै विब्भार । बीर बाधै बद्धाली ॥ अद्धाली अर बद्धि । कंध सोहैं सुद्धाली ॥ सुद्धाल कंध विव षंड धुअ । विधि ओपम कवि चंद कहि ॥ आउत्त घत्त आजान भुअ । मनु कजल कोटक विज लहि ॥ छं० ॥ १४२ ॥ रू० ॥ ८३ ॥ ८१ पाठान्तर-कौं । दोउन के असराल युद्ध । सो चंद करीय सु काब ॥ ८२ पाठान्तर--अलुथं सलुथं । सलुथं सलोथं । अलुथं तिलुथं । उयानं । पलथं । हयं गंरथं । तुहैं । लुहैं ॥ १३६ ॥ पलकैं । रुधिजा । प्रबाहं । कंन । भनकंत । चिकारे । सुहथी । नचै । भैरौं । ततथे । ततथी ॥ १४० ॥ अलुभं । अरुझैं सुदंती । अलुझंत । उड्डे । झुकं । हयनं । गयनं । परै । तुटें ॥ १४ ॥ ८३ पाठान्तर-आजान । वाह । पसारे । उभारै । उभारै । विभार । बढाली । वढाली । अरिकट्टि । सोहैहैं । सुढाली । सुढालि । पंघ किक्कि षंड हुअ । उपम । आवत । छत आजानु । मनौं । मनौ ॥
कवित्त ॥ लोहांनै अरि फौज । चक्क चिहुँकोद फिरांइय ॥ ज्यौं तूल मध्य वातुल । पवन जिम पत्त भ्रमाप्य ॥ मारुत वलि आरिष्ट । बापू चिहुँ कोद भुलावय ॥ कै वाय पुरातन धज्ज । बिबिधि विध तुंग दखायय ॥ कै कुद्धान्त चित चक्कित भौ । चक्र चिहूं दिसि फेरइय ॥ मृगराज मृगनि ज्यौं क्रोध बल । दल सम्मृह अरि घेरइय ॥ छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ८४ ॥ कवित्त ॥ तहां बिख्फि पिथ कुँअर । लोह भारै गज मध्यं ॥ भय भसुंड विपंड । अंम सोभंत सुतथ्थं ॥ कै * जलधि तह छवि सोम । धोम धारा घृत सिंचिय ॥ कै * तडित तेज नव घंन प्रमान * । भान चलि बहल संचिय ॥ कज्जल प्रमान प्रब्बत ढल्यौ । रत्त धार बुट्ठंत जलु ॥ कंचन प्रनार दै सुर अवकि । इह ओपम दीसंत षलु ॥ छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ दूहा ॥ जावक ओन प्रनार जल । इंगुर फटिक वछात ॥ जीवत रद कढि रुचिर तिन । दंतू सर दररात ॥ छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ कवित्त ॥ लोहांनी आजान बाहु* । जित आरनि जस लिन्नौ ॥ ज्यौ इक लेई कन्द । दंग दावा नल पिन्नौ ॥ ज्या इकले हनुवंत । बंक लंका गढ ढाथ्यौ ॥ ज्यौं इकलेई भीम । सित्त कौरव तन गायौ ॥ ८४ पाठान्तर-लोहांनौ । चिहु । काँद । ज्यौं । तुल । मधि । भ्रमाइय । बलि । चिहु । ध्वज । विधितुंग । भयौ । चिहुं । फेरर्दय । ज्यौँ । घेरिईय ॥ ८५ पाठान्तर-पिन्नि । कुंआर । मथं । भईय । तथं । कें । तरह । चिंचिय ! चिंचीय । * यह सब अधिक पाठ हैं । भांम । बहूलह । फजल । प्रमांन । प्रबत । ८६ पाठान्तर-प्रनाल ॥
३५८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३० ज्यौं पुनि अगस्ति अप डुक्कलि । खोषि सब्ब सायर खयौ ॥ दांनव क्ति चंपि अंगद वलिय । नंपि उदधि परसैं गयौ ॥ छंदं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ८७ ॥ कवित्त ॥ वल बंध्यौ नाहर नारिंद * । इंद्र जनु वज्र छह्य ऋषि ॥ सुकति सुफल बड्डीय । बोर ब्रह्मांड तार पुत्ति ॥ नर नाहर ज्यौं लस्यौ । लज्ज पंकल्ल आनुभयौ ॥ सार धार निह्तार । पार सुक्कियग जग सुस्रथौ ॥ कुलछंत केल्लि परिचाररिन । चिसल तेज लग्गिय चिसुक ॥ भग्गौ न भूमि रजपूत हैं। करौं नाम जिम अटल धुव ॥ छंदं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ कवित्त ॥ सुनिय मंच सेवकक प्रमांन * । रघट घही फेरहि एम ॥ पेट भरन * चह्यंत । पुठ्ठि दै भार चलचि कम ॥ ते नह गनियै सूर । अंत किचिन कौ नांची ॥ स्वांमि संकरैं छंडि । लो अन्नप्पन घर जांची ॥ गनियै न सूर अरि जूझ बल । अप्प सेन इषि घट्ठियै ॥ जै अजै भाग भूपति कमह । अप्पु दोस अप मिट्टियै ॥ छंदं० ॥ १४८ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ कवित्त ॥ वाय रूप प्रथिराज । गज्जि गयो असि झुक्कं ॥ सार धार उक्तार । गुरज भंज्यौ सिरभूक्कं ॥ रच्यौ आन रथ पंहि । पवन रच्यौ गति कुंडि थिर ॥ रहे देव टग चाहि । नथै वैताल बीर भर ॥ ८७ पाठान्तर-* अधिक पाठ है । जिति । लौनौ । ज्यौं । दुकलेइ । इक्कलेंद । ज्यौं । इक्कलेंद । हनवंत । हनुमंत । ज्यौं । इकले । सत्त इकले । सब । दांनव । परसों ॥ ८८ पाठान्तर-नाहर । * अधिक पाठ है। हथि । हथ । सुगति । ब्रह्मंड । ज्यौं । जल पंकल्ल । निभार । मुक्किग है। । करौ। नांम ॥ ८६ पाठान्तर-सेवक । * अधिक पाठ हैं। घटी। घटिका पुठि । चलि । कौं। स्वामी । जांहीं । रखि । भुञ्चाति ॥
सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३५६ लंपे जु राज कित्ती प्रवछ । लोह मरन हुल्लंत दिन ॥ पछ पंद राज पच्छै चढी । नाहरराउ नरिंद रन ॥ छं० ॥ १४८ ॥ दृ० ॥ ८० ॥ कवित्त ॥ नाहर राउ नरिंद । चित्त चिंता उत्तारिय ॥ मन वध्यौ घन घय्यौ । मरम केवल विचारिय ॥ सुनहूं तौ * कहूं कवित्त । सुथिर जीवन जग नांची ॥ एह संसार असार । सार कित्ती कलु मांची ॥ ज्यौं उरगए सुप उंदर परै । यौं सुदेस नाहर कधै ॥ सपनव्य बात भिक्षै नहीं । नाम एक जुग जुग रचै ॥ छं० ॥ १५० ॥ ६० ॥ ८१ ॥ दूहा ॥ दूप कपि रचि रन मंड रूपि । ज्यौं कपि रक्खस सेन ॥ कोपि कान्ह धायौ बली । ज्यौं अगि विकुठिय गेन ॥ छं० ॥ १५१ ॥ ६० ८२ ॥ कान्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥ विराज ॥ धप्प्यौ कान्ह घही। फुटी अंधिपही ॥ खरी सेन फही। मनौं दूध षही ॥ छं० ॥ १५२ षगंगे उछही । मनौं कठ कही । परे भूमि लही । मनौं मद जही ॥ छं० ॥ १५३ ॥ बद्दै पग्ग घही । मनौं चक्क मही । तरफैं कि नही । मनौं लागि नही ॥ छं० ॥ १५४ खरै यों सुभही । मनौं लौन नही । सुरैं मारि रूही । मनौं लत्त तही ॥ छं० ॥ १५५ ॥ पसू पंष ठही । पषं ओन चही । कषीचंद भही । मुषं कित्ति रही ॥ छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ८३ ॥ ८० पाठान्तर-प्रथीराज । गजि । उद्भार । भांन। गषन । मंडै । यु । रासि । कित्ति । सोई । पक्कै । नाहरराव ॥ ८१ पाठान्तर-नाहरराय । चिंत चिंता । उतारीय । केवलह । विचारीय । सुनहु । सुन हूं । * अधिक पाठ है । नांहीं । ज्यां । उरगह सुमुप । यों । सुमिट्टै । ८२ पाठान्तर-हनं । ज्यां । रंपस । कन्ह । ज्यो । विकुट्ठिय ॥ ८३ पाठान्तर-* सं० १६४७ की प्रति में शुद्ध नाम विराज है और इतर में छंद रसावला है ॥ १५२ ॥ मनं । कठ । परैं । मनौं । मनौ । मद ॥ १५३ ॥ बहै । मनं । तरफै । लाग ॥ १५४ ॥ लरैं । यों । मनं । लांन । मनं । लत ॥ १५५ ॥ पसूं । घट्टी । कवि ॥ १५६ ॥ १४
३६० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३२ कवित्त ॥ नाहर नाहर राव । कन्हर नाहर सुकन्ह कर ॥ दिठ्ठ दिठ्ठ अंकुरिय । अरिय विस जांनु बिखद्दर ॥ उमसि कन्ह असिरीस । सीस चुकि परिय बांम भुज ॥ पुनि उक्कुटि परिच्छार । सार सिर कन्ह टोप धुज ॥ लग्गे सुटोप उड्डिय किरच । बढ़त धार उन संग बचि ॥ जैजया सद् जुग्गिन करचि । दुअन जुद्ध अदभूत सचि ॥ छं० ॥ १५७ ॥ छ० ॥ ८४ ॥ डारि कंन्द तरवारि । कट्ठि जम दढ़ मिल्यै चिय ॥ सचि जुद्ध दूत बीच । धप्प भतीज दिषि निय ॥ गचि सुसिष्ष पुठि आइ । घाइ जम दढ़ कियै तिय ॥ छंडि प्रान परिच्छार । परे पाल्हन ऊपर जिय ॥ गचि रोस नंपि नर भूमि पर । अनि अनियारिय उभय कसि ॥ तिन अनत घाय घुंमत झुमत । गयौ निठ्ठि नाहर निकास ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ बर नाहर जिम लखै । गयौ नाहर जिम नाहर ॥ घाव घट घन घुंसि । झुंसि निक्कसिय बल नाहर ॥ कन्ह कंक किय नन्द । बंक भर भूमि पछारिय ॥ जनु कि लँगूरह लंक । तोरि बारा धर डारिय ॥ सादान बज्जि रन रज्जि सच । तत्त सु सस्थरकत करिय ॥ सोमेस सूर चहुआन सुअ । कित्ति चंद कंदच धरिय ॥ छं० ॥ १५९ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ ८४ पाठान्तर-कंन्द। दिठ दिठ। जांनि । परीय। बांम । फुनि । उक्कंटि । उकुटि । कन्द । उडिय । सबद । जुगिन ॥ ८५ पाठान्तर- कन्ह । जमदठ । मचि । जुध । वीचि । धपि । भतीज । दिषिनीय । सिषि । पुष्ठि । जमदठ । प्रांन । पल्हन । उपर । अनिथारीय । निठि ॥ ८६ पाठान्तर-घट । धूमि । भूमि । नन्ह । भूमि । लंगूरह । डारीय । सादांन । ब्रजि । रजि । सथ । करीय । चहुवांन । चहुवांन । सुय । कंदहि ॥
सातवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१ दल घट्क्यौ सब सथ्य । जुद्ध धायौ तत्तंरिय ॥ चाहुआन कौ साथ । तेग तुंगह विडारिय ॥ उंच गात अरु हत्थ । वीर कही पट भारिय ॥ एइ ओपम कविचंद । चिंति मन मझ्झ विचारिय ॥ पल्लव सुवीर केतुक नवन । षरबंसंत वायद्द चल्लै ॥ तम तेज रुधिर भींज्यौ बहुल । कज्जह कित्ति जावक घुलै ॥ कूं० ॥ १६० ॥ छं० ॥ ९७ ॥ दूहा ॥ नाहर नाहर जिम निकसि । भिरि नाहर के भेष ॥ कहर कन्ह धपि कुप्पि पुठि । वली मीर चष लेष ॥ कूं० ॥ १६१ ॥ दू० ॥ ९८ ॥ कुंडलिया ॥ फिरि जुझार किय स्वामि कौं । मुक्तियं काम धमारि ॥ बली मीर गढ्ढौ लयौ । मरन सरन विचारि ॥ मरन सरन विचारि । मिलन अंतहपुर किन्नौ ॥ बँधि चिय सांइ सुभित्त । करि सांई सौं दिन्नौ ॥ सार धार तन षंड । षंडि मायौ रिपु जुर जुरि ॥ तिल तिल तन तुट्ट्यौ । रंभ ढुंढ्ढौ चित फिरि फिरि ॥ कूं० ॥ १६२ ॥ कुं० ॥ ९९ ॥ दूहा ॥ सिर तुट्टै परि भूमि पर । यौं राजै कविचंद ॥ कमल जानि नचंत सर । सरद चंद पर कंध ॥ कूं० ॥ १६३ ॥ दू० ॥ १०० ॥ कुंडलिया ॥ कमल जानि नच्यौ जु सर । दिसि सोभै संग्राम ॥ मानहु जलद कमोद तजि । थल आए ए ताम ॥ ९७ पाठान्तर-सथ । तत्तारीय । चाहुवान । विडारीय । हाथ । कट्टी । भारीय । उपम । मन सों । विचारीय । विच्यारिय । बायह । भंज्यौ ॥ ९८ पाठान्तर-नाहर कै । लेषि ॥ ९९ पाठान्तर-स्वामि कों । मुक्तिय । काम । गल्लौ । शरन । विचारि । अन्तरपुर । बंधि । चीय । सांई । सुभित । सुभृत । तिल तिल्ल । ढंढ्यौ ॥ १०० पाठान्तर-तुट्टै । यों । राजि । राजै । जानि । नाचंत । शरद कंच ॥
३६२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३४ थल जए ए ताम । चंद ओपम तहां पाई ॥ मांनहु वीर समुद्र । दयौ फत्त ध्य्य बधाई ॥ धार धार चढि सूर । सूर कीर्त्ति विमलं ॥ धंनि धंनि उच्चार । सीस नच्चौ सुकमलं ॥ छं० ॥ १६४ ॥ रू० ॥ १०१ ॥ नाहरराय का भागना और पृथ्वीराज का पीछा करना ॥ कवित्त ॥ भग्गा नाहर राई । पाई मुक्कै नाहर जिम ॥ जिम जिम भर कह्रई । रोस लग्गा वर तिम तिम ॥ बेत सोधि चहुआनं । पर्यो तूंवर पाछारी ॥ बर* परस्यौ तहां गोइंद । पर्यौ भट्टी अधिकारी ॥ षांची प्रसंग बंधव उसै । मोह सुबंधा बंध वर ॥ तिम तिम सु तेग तारून षसै । तिस तिम बुट्ठे सार नर ॥ छं० ॥ १६५ ॥ रू० ॥ १०२ ॥ चिविध सहस्र नाहर * बसंत । पच कायर तन झारिय ॥ वीर रूप तप भान । नीर सूखै षत्त भारिय ॥ तत्तरि तुंअर नरिंद । भयौ तरु गहर पत्त कूँछ ॥ छांच स्वांमि संमूह । जूझ टारिय सुअंग तच्छँ ॥ फल फूल कित्ति पंषी वरन । विमुख न भौ संमुह लख्यौ ॥ गंधर्व वीर चालुक वरन । मरन वीर अच्छरि बरयौ ॥ छं० ॥ १६६ ॥ रू० १०३ ॥ १०१ पाठान्तर-जांनि । जानैं । नच्चैौ । सुर । मानहु । थल ए उए तांम । उपम । पाइय । मानहु । हथ । बधाइय । किए ति । किए सु । धनि २ । उच्चार । नंच्यौ ॥ १०२ पाठान्तर-नाहरराय । पाय । मुक्या । कह्रई । रोस । चहुवान । चाहुआनं । तूंवर । तूंअर । पहारी । परहारी । * अधिक पाठ है । तथा उलट पुलट पाठ ऐसा है-बर गोइंद तहां पस्यौ । बध्या बंधवर । तेज ॥ १०३ पाठान्तर-सस्त्र । * अधिक पाठ है । झारीय । भांन । सुक्कै । झारीय । तत्तारी । तूंअर । तोअर । पंत्त सह । पत्त कूंह । छाह । स्वांमि । टारीय । तहां । भौं। गंधर्व्व वीर चारन वरन । अक्करि ॥
सातवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासौ । ३६३ गुज्जर वै परधान । जैन धुम्मी मत लड्ढी ॥ एकादस चहुआन । धर धारह आलुड्डी ॥ सहस एक असवर । धार वै गै घर मंड्यौ ॥ नाहर राइ नरिंद । कोट पहन वै चढ़क्यौ ॥ ढुंढयौ षेत चहुआन बर । अरु भारथ आहुह्यौ ॥ चामर सु कवच धरि षेत में । सुधा विविध विधि लुह्यौ ॥ छं० ॥ १६७ ॥ रु० ॥ १०४ ॥ डोला पंच पचीस । स्वामी संजुत्त चढाइय ॥ घाइ कन्ह घट घुम्मि । घाइ एकादस राइय ॥ चंपि बीर चालुक्क । राज मेलान तुच्छ करि ॥ गल गज्जै सामंत । बरै बरनी नाहर बरि ॥ रविवार बीर पंचमि दिवस । एकादस रविभुअन ग्रह ॥ अष्टम सु चक्र जोगिनि ग्रहण । बर बज्जेति नरिंद तह ॥ छं० ॥ १६८ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥ देव दसमि कै दीह । नयर पहन चहुआनं ॥ गुर पंचम रवि नवम । सुवर ग्यारह ससि धानं ॥ तीय थान बर भौम । सुक्र सप्तम बल किन्ना ॥ केंद्री बर बुद्ध । राह सब कौंद अहिन्ना ॥ आनंद चंदं बरदाइ घन । राजभिषेकन पहि करि ॥ साजंत भूमि जीते सुपत्ति । तेज तुंग दुज्जन सुहरि ॥ छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ १०६ ॥ १०४ पाठान्तर—गुज्जर । परघांन । धुंम्मो । धुमी । चहुवांन । आलुही । नाहरराय । चढ्यौ । चहुवांन । आहुट्यौ । लुट्यौ ॥ १०५ पाठान्तर—डोंला । स्वांमी । स्वांमि । घाय । घूंमि । घुंम्मि । धाय । ईकादस । मेलांन । तुछ । बरैं । बरौ । बजेति ॥ १०६ पाठान्तर—चहुवांनं । चहुआनं । यांन । कीनो । केंद्री । सबकोद अहिना । बरदय धनं । पट । दुजन ॥
३६४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३६ दूहा ॥ तिरिय वक्र अधचक्र नन । ऊरध वक्र प्रमान ॥ पून नखिच चहुआन वै । पट अभिषेक समान ॥ छंद ॥ १७० ॥ छ० ॥ १०७ ॥ कवित्त ॥ पून नखिच कविचंद । कौन वान् उपावै ॥ पटभिषेक राजान । बहुत आगम प्रभावै ॥ ग्रच प्रसाद * तोरन उतंग । कूच जंचह सक ठावै ॥ ध्वजा बंधि पत्ताक । संष चामर मंडावै ॥ उद्यत्त परब पनि अर्चन । बहु विवेक घंमच सुधरि ॥ नन कूप तडागन वापियन । धन सुकियन सुकियन बरि ॥ छंद० ॥ १७१ ॥ छ० ॥ १०८ ॥ नाहरराय का हारकर अपनी कन्या के विवाह का लग्न लिखवाकर भेजना ॥ छंद पहरि ॥ सब सथ्थ तथ्य हुअ एक ठांम । मुक्कांम कीन गिरिनार गांम ॥ सब लोक महाजन मिले आइ । चिंत्यौ सुचित्त नाहर सुभाइ ॥छं॥१७२॥ जिणि मेल होइ सो करि उपाइ । दिप्पियै दीप ल्हो नहीं खाइ ॥ पहुमी सुकाज अर तजत प्रान। पहुमीस काज धन देत दान ॥ छंद॥ १७३ ॥ पहुमीय काज जग बाजि देत । उपाइ नेक पहुमी सुलेत ॥ पुत्री सुएक तिन तन कुआरि । दीसंत देह जनु मदनधारि ॥ छंद ॥ १७४ ॥ बुल्लाइ विप्र लिखि लगन तथ्य । पठाइ दीन नृप पिथ्थ जय्थ ॥ आनंद राज सब सेन अंग । फुल्ले कि कमल जनु दिषि पतंग ॥ छंद० ॥ १७५ ॥ छ० ॥ १०९ ॥ १०७ पाठान्तर=तिरीय । प्रमाणं । चहुआन कौं । पटभिषेक । समांन ॥ १०८ पाठान्तर-कौन । उपावै । पाट विभेक रजांन । पाटभिषेक राजांन । आरांम ।
- अधिक पाठ है ॥ उतंग । पताक । उदयं । उद्यंत । पांनिं । पांनि । घुंम्मह । तटांकने । धन मुकियन मुकियन वरि । मुकियन चुकियन वर ॥ १०९ पाठान्तर-सब्ब । सर्थ । तथ । हूष । ठांम । मुकाम । गिरनारि । गांम । सब्ब । मिलियं । आय । चिंत्यौ । सुभाय ॥ १७२ ॥ जिंहिं । होय । उपाय । दिषियै । नही । लाय । पुहमी । प्रांन । दांन ॥ १७३ ॥ उपाय । कुवार । धार ॥ १७४ ॥ बुलाय । तच्छ । पठाइ । पिथ । जय । फूले ॥ १७५ ॥
सतवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥ कवित्त ॥ नट्ठा नाहरराइ । सेन ढूंक्यौ चहुआनं ॥ राज जीति गज लब्धि । सीस लग्गा असमानं ॥ सुम मल्लह परिछार । मत्त कीनौ अमिस जुध ॥ बरन बीर संमुहौ । राज लग्गे सुमंत सुध ॥ पंचमी बार रवि रात दिन । मंज नाम बर जोग गुर ॥ गिरि नाम करन राजन बर । चह्यौ बीर बारंस डर ॥ छं० ॥ १७६ ॥ ११० ॥ पृथ्वीराज का तोरन की बंदना करना ॥ कवित्त ॥ बंदिं राज तोरन्न सुचंग * । मुति नख्यै अच्छित अलि ॥ मनां * चंद किरनि छूटंत । भान नखै मयूष छबि ॥ ठाम ठाम घिय गान । जानि अच्छरि कैलासच्च ॥ सुभ सिंगार सोभंत । भूमि रचि अलि रस बासच्च ॥ तोरन सुचरु आचार करि । कै जनवासत मंडपहि ॥ दिष्षंत नयन भुल्लहि चरित । काः कवि ब्रन्दहि आव कहि ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ १११ ॥ पृथ्वीराज का नाहरराय की कन्या से विवाह होना ॥ दूहा ॥ करि आचार सब पंडित । पानि ग्रहन फुनि व्याह ॥ सोम बास ससुनाइकै । धनि नाहर कत्याह ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११२ ॥ ११० पाठान्तर-नठा । नाहरराय । ढूंक्यौ । चहुआनं । लभि । मल्लह । मत्तह । मत । अमित । जुधु । लगा । राति । नाम । गिर । नांम । बरन । चढौ । बीरंसु ॥ १११ पाठान्तर-तोरन । * अधिक पाठ रै । मुति । नयें । छुट्ठत । नंपै । ठांम ठांम । जीय । गांन । गांम ॥ ११२ पाठान्तर-पंडितन । पांनि । फुनि । सोबास्रब सुनायकैं । सोबास ससुनाइकै । धंनि । कत्याह ॥
३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८ नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥ दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस । और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥ छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥ नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥ साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा । सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥ रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली । श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥ छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥ पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥ कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥ उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल । बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥ प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥ अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥ काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥ छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥ अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥ धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥ छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥ ११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥ ११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली । श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥ ११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं । विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥ ११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥