भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३४६ संभारि बीर चालुक्क भूप । उपज्यौ ब्रह्म कुंडह अनूप अतताइ तुरंग तेरह सुपंड । षिजि रह्यौ रोपि रन रोद्धि झुंड ॥ ॥ कूं० ॥ १०० ॥ तिन ठाम आइ नाहर सुघरि । वाहंत हथ्थ जनु करिय केरि ॥ ॥ छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ इधर पृथ्वीराज इधर नाहरराय का सन्मुख युद्ध ॥ कवित्त ॥ उत प्रथिराज नरिंद । इत सुपरिचार प्रबख रन ॥ दुअन सेन असि कढ्ढि । करन कऋषंत समय जनु ॥ दुअन अङ्ग संनाह दुअन नष चष उघारें ॥ दुअन इष्ट आरंभ । दुअनि दुअ हथ्थ दुधारें ॥ दुअ सुम्भि अङ्ग दुअ देव जनु* । दुअन धार दुअ तुक बढ़िय ॥ संनाह कहि कही सुनूह । तस उपम चन्दह कहिय ॥ छं० ॥ १०२ ॥ रु० ॥ ५९ ॥ कवित्त ॥ दुअन हथ्थ दुअ भूप । रूप अदभूत रेष बढ़ि ॥ इन्द्र सिलह प्रथिराज । चंद्र परिचार तेज गढि ॥ दुअ अभंग संनाह । दुअन देवन आधारन ॥ दुअन तेज तन अंस । हंस दुअ हंस समाधन ॥ अवतार भूत दुअ देव सम । दुअन चिन्ह उत्तम करिय ॥ परभास षेत परब्रह्म दुति† । भृगु लंङ्कन जनु धरि धरिय ॥ छं० ॥ १०३ ॥ रू० ॥ ६० ॥ ५८ पाठान्तर-* ये ९४ । ९५ और आधा ९६ छंद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ प्रथीराज । तांम । वांम । दुल्लह । पुत ॥ ९४ ॥ ज्यौं । थांन । पुलेन । सज्यों ॥ ९५ ॥ मतौ । बजी । लाग । निसांन । दिसांन ॥ ९६ ॥ वजिग । गजैं सुराज हय हठ हौंस । गिरनारि । दूट । गर्जे । घट घट ॥ ९७ ॥ बैरष । बढे ॥ ९८ ॥ हहकार । भट । सबांन । आजानवाह । स्वामित ॥ ९९ ॥ चालूक्र । ऊपज्यो । तुरंग । रोहि ॥ रिन रोपि ॥ १०० ॥ ठांम । हथ ॥ १०१ ॥ ५९ पाठान्तर-प्रथीराज । कढी । सनाह । चप । हथ । दुधारें । सुभि । कटि । कटी । *उपम ॥ ६० पाठान्तर-हथ । प्रथीराज । रहि । उत्तिम । द्युति । भृगु । लकिन ॥ * एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअन इष्ट आरंभ" से "दुय देष जनु" तक नहीं हैं। परंतु सं. १६४७ की में हैं † एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअ देव सम" से "ब्रह्म दुति" तक नही है। परंतु सं. १६४७ की में हैं ॥