पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८ नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥ दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस । और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥ छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥ नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥ साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा । सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥ रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली । श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥ छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥ पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥ कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥ उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल । बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥ प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥ अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥ काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥ छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥ अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥ धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥ छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥ ११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥ ११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली । श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥ ११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं । विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥ ११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥