भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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सातवां समय ३६ ] पृथ्वीराजरासो । ३६७ संग वरनि डोला चढ़ि गजं । सनौं रत्ति दुति काम समाजं ॥ को अलि डोलनि सथ्य सुसाजं । चढ़ि सब सथ्य बजावत बाजं ॥ छं० ॥ १८३ ॥ रु० ॥ ११७ ॥ पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥ गाहा ॥ करी जर्जन सरीरं । भीरं भंजि स्वामि का खेवं ॥ ग्यारह डोल सुसथ्यं । कथं पत्तेव संभरि गेहं ॥ छं० ॥ १८४ ॥ रु० ॥ ११८ ॥ पृथ्वीराज का विवाह कर घर पहुँचना ॥ दूहा । ग्रह पत्तै जित्तौ सथन । परनि सुचंगी बाज ॥ जंभा वीनं न्निम्मयौ । कुँअरप्पन सुचि लाज ॥ छं० ॥ १८५ ॥ रु० ॥ ११९ ॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ वंस अनन्त चहुआन । भयौ न पिथ समकोई ॥ जिन षंडे छत्र षग्ग । दीन वंदै सब खोई ॥ जिन नाहर राइ नरिंद । पंडव सच पञ्जारिय ॥ जिन वंभनवा सो सिंघ । वान ढल्यो गंजाड्य ॥ अरि घरन घरनि घर चैन नहि । सयन निसंकन संचरहि ॥ वन गहन बहन विह्वल फिरहि । बंदर ज्यौं कंदर वसहि ॥ छं० ॥ १८६ ॥ रु० ॥ १२० ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके नाहरराइ कथा वर्णनं नाम सप्तमो प्रस्तावः ॥ ७ ॥ ॥ इति ॥ ११७ पाठान्तर- बरनि । मनो । रति । डोलन । सथ ॥ ११८ पाठान्तर-करि । भंजि । सुसथं । संभरी ॥ ११९ पाठान्तर-गृह । विमयो ॥ १२० पाठान्तर-चहुवांन । भय । पियह । नाहरराय । नाहरराव । पंजायीय । सैं । बांन । ठट्ठौ । ठढौ । चैन नह । ज्यो ॥