भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आठवां समय ४] पृथ्वीराजरासो । ३०३ मुद्दलराय का पत्तोत्तर देकर सोमेस्वर और पृथ्वीराज दोनो से लड़ाई मांगना ॥ साटक ॥ स्वस्ति श्री सउमेस राजन बरं । प्रिथ्राज राजं बरं ॥ तो पत्तं सुनि अन्न कग्गद बरं । पल्यंज आकृतयं ॥ जाजा भंजन सेन साहस रने । प्रातं प्रतं जुद्धयं ॥ नां किज्जै तिन टाम पचिय घरं । छिभ्या किमा कामनं ॥ छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ ११ ॥ सोमेस्वर का अपने लड़के के बध के विषय में संशय करना ॥ दूहा ॥ सिसु संसौ सम्ही फिख्यौ । उभय काम बध बीर ॥ जौ मुक्कै चिय अधम छत । तौ दल सद्धि सरीर ॥ ॥छं० २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥ और पृथिराज के पास मुद्दलराय के पत्र का संदेसा भेजना और उसका रोस में आकर पिता के पास रण में आ मिलना ॥ कवित्त ॥ छह भग्गा तिय पुच्छ । तात मुक्यौ संदेसं ॥ अरिन सयन संमुद्धौ । जुद्ध मंगन अंदेसं ॥ बाल कठिन कर ग्रह्यौ । भ्रम रखन पित कागर ॥ जु कछु अग्ग संभवै । सोइ किज्जै सुमंत नर ॥ चढि बाल वियोगन कंत अप । सो निस रख्यै राज सिसु ॥ सामंत दोह भय प्रात बर । चढि चल्ल्यौ संग्राम किसु ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥ कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । तात मुक्यौ संदेसं ॥ भयौ रोस जाजुल्य । तुल्य पावक सुमिसं ॥ ११ पाठान्तर-स्वस्तश्रो । सोमेस । प्रथीराज । प्रथिराज । तो । श्रवन । पलपंच । पल्यंन । प्रात । प्रातं । नां । किजै । ठाम । पिञ्जिय । छिमया ॥ १२ पाठान्तर-दोहरा । संह्री । पर्यौ । उभै । मुकै ॥ १३ पाठान्तर-भगा । पुछ । पुद्धि । मुक्यो । संदेस । अरिय । सैनं । अंदेस । रखन । यु । आप । निशि । रख्यो । राजें । सामंत । राज बर । चढे । चल्पो । संगाम ॥