पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १२ भरि बांच कान निक्खि लोच मुठि । दिष्षि षवासति ओट करि ॥ ओडन समेत संनाच षस । सर सुविधि फुट्टिग निकरि ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३६ ॥ कवित्त ॥ धुक्कत धरनि षवास । कोपि कयमास काज कर ॥ वज्ज्र घात बख्खिबंड । छन्निग तरवारि टोप पर ॥ टोप तुट्टि सिर फुट्टि । सम सुसंनाच चीर छुच्च ॥ बख्खर पख्खर तुट्टि । तुट्टि द्वय खंड परिय जुच्च ॥ जय जया सद्द आकास छुच्च । सुमन सघन उप्पर झरिग ॥ देष्षंत कछर करिबार बर । स्सेन सघन बिंदुंरि उरिग ॥ छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ जहँत देन धर धरन । तहँत बड गुज्जर रामच ॥ तहँ मुंगल रषन समर । संग घत्तिय सिर सामच ॥ तुरखबोंध सिर टोप । फुट्टि छुप्परि रत बुद्धिय ॥ तहां उठंग ढूक बीर । जानि जमराँन सुरुट्टिय ॥ तरवारि तेज नारेन छन्नि । धर असंध तुद्दिग धरट्ट ॥ अनभूत दृस्ट अवसान बढि । करच्चि देव बंदन बरट्ट ॥ छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३८ ॥ कवित्त ॥ जहां अंगद मरदांन । कन्ह तहां जांनि नाग भुच्च ॥ मिल्ले तक्किक तरवार । झारि उब्भारि सीस दुच्च ॥ मेक्विय मांगद्द सीस । टोप कहिय सिर धारिय ॥ नर बांधै झटि कहि । अद्ध अद्धं करि डारिय ॥ ३६ पाठान्तर-जहां । बांणीद पठांन । तहं । तहां । दुच्च । चत्रु । भिरि । मिलि क्रोह । दिषि । ३७ पाठान्तर-केमास । बलिचंड । जुट्टि । बषर । पषर । जुट्टि । जुट्टि कैं षंड परिय जुग्र । जै जया । हुय । दिष्यंत । बिंदुंरि डरिग । ३८ पाठान्तर-जहांन । जहंन । धरत । तहांत । तहत । गुजर । रांम । तहां । मुंगल । रषन । घत्तिय । सांमह । विधि । सेर । बुट्टिय । उठग । ईक । जांनि । यमरांन । जमरांन । जुट्टिग । अवसांन ॥