भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 470 में से

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पृष्ठ 389

ग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३०६ देखे वीर लग्गे । बढै चारु अग्गे ॥ डितैं नाचि डिग्गे । मचा सोर अग्गे ॥ छं० ॥ ५१ ॥ परैंके अहग्गे । न वैरीन सग्गे ॥ तजै नाम पग्गे । ... ... ... छं० ॥ ५२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ गाथा । जग्गेयं जुध वानं । कुंभे यनं कंकालं कार्यं ॥ दंतं मुप्प करेयं । वाछंतं वीर सुभटायं ॥ छं० ॥ ५३ रु० ॥ ३४ ॥ रन में मरे और घायल कैसे पड़े दीखते थे और कौन कौन योद्धा किस किस से घायल हुए और मारे गए ॥ कवित्त ॥ हय हिंसहिं गज चिक्कारि । भगर सम दिषि हुन्नाचल ॥ वखि पंपिनि बेताल । नंदि नंदिय ओन्नाचल ॥ गिद्धि सिद्धि किल्लकांत । ईस सुंडावलि संधय ॥ चकि कैमंध पर त्रुटि । चढी देवी दल संधय ॥ उपमान तास कवि चंद कहि । सुभत सनाह सुकाञ्चनिय ॥ जाने कि कृष्ण वृंदावनह । रास रमै निसि ग्वाखिनिय ॥ छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३५ ॥ कवित्त ॥ * जच्चैं बाजीद पठान । सघन पुरसांन पांन तहँ । हय कटि दुव तंडीर । उभय कम्भान तांनि सच ॥ उंच कछर कंधान । छोट गिरि दांन लव भुच्च ॥ रक्त त्रांन सुष चप्पु । कांक अनसंक अवनि धुच्च ॥ ३३ पाठान्तर-इतर पुस्तकों में इस छंद का नाम रसावल वा रसावला लिखा है परन्तु हमारी सं० १६४७ की पुस्तक में शुद्ध नाम विराज है वह हमने प्रयोग में लिया है क्योंकि यहां पर उसका ही लक्षण मिलता है अर्थात् वह दो लघुगु का होता है और रसावल दो गुलगु का होता है ॥ घट । मनों । बढ़े । आगें । अग्रे । अग डिगें । नांहि । सोर बग्गे । फरेंके अछगे । सगे । तजै । नांम ॥ ३४ पाठान्तर-कुंभेयन कंफलं कादं । दंदं मुप । सुभटादं ॥ ३५ पाठान्तर-हिंसहिं । हिंसहि । दिपि । पंषिन । गिड्डु । सिड्डु । संघिय । कमंध । परि । तिहि उपमान । उपमांना । निकि ग्वालिनोय ॥

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