पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ६ करि सत्त नाव तिष्ठि पर धरे । अनक्रांपित जिम गैन धुअ ॥ ऐसेऊ चंद कहि पीथ सम । गरुअ तन नृप अरग हुअ ॥ छं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ १६ ॥ * जैसे शिवजी गले में विष धारण किए हैं वैसे ही मीर को आप भी रखिए यह चन्द ने कहा ॥ दूहा ॥ संकर गर विष कंद जिम । बडवा अगनि समंद ॥ तै रषहु चहुआन तिम । षां हुसेन कहि चंद ॥ छं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ १७ ॥ * सुन्दरदास से पूछना कि सब स्त्रियां तो सुख से हैं और शाह से झगड़ा होने की बात क्या सच है ? दूहा ॥ मिलिय सु सुंदर दास तँहँ । पुच्छिय विधि विधिवत्त ॥ कहौ सुषी त्रिय सब विवरं । विरस साचि सैं सत्तू ॥ छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥ सुन्दरदास का कहना कि हूर की ऐसी एक पातुर शहाबुद्दीन के पास थी उसको लेकर हुसैन यहां चौहान की शरण में आया है ॥ दूहा ॥ पांच एक्क साचाब संग । हूर नूर गुन गान । वै आयौ हुस्सेन इत । सरन तक्कि चहुआन ॥ छं० ॥ १९ ॥ रु० ॥ १९ ॥ चन्द का पृथ्वीराज की प्रशंसा करना कि जैसे मोरध्वज के यहां अर्जुन ब्राह्मण बन कर शरण गया, भगवान ने सिंह बन कर मांस मांगा, शरणागत द्रोपदी का चीर बढ़ाया, वैसे ही तुमने शरणागत को रखकर क्षत्रिय धर्म की रक्षा की तुम्हारे माता पिता धन्य हैं ॥ १७ पाठान्तर-ते । रख्खौ । चहुआन ॥ १८ पाठान्तर-तहां । पुछिय । सुषि । त्रीय । विसर । सों ॥ १९ पाठान्तर-संग । गांन । हुसेन तब । तकि । चहुआन ॥