भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

नवं समय २ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१ कवित्त ॥ सोरन्नज दै सरन । गयौ दुज दोइ सु अर्जुन । सिंच रूप धरि कन्ह । संस संस्यौ करि गर्जन ॥ दैन चीर अरधंग । नृपति सिर कर वन धाख्यौ ॥ देखि महा सतवंत । प्रगट गोविंद उच्चायौ ॥ धनि धंनि मात पित धंनि तुअ । सरनागत भ्रम तैं रखिय ॥ पिछी कहंत कविचंद सौं । संभरि वै निचि सम उषिय ॥ छं० ॥ २०॥ रू० ॥ २०॥ शाहहुसैन का पृथ्वीराज से मिलना, पृथ्वीराज का आदर देना ॥ दूहा ॥ गयो राज सामंत सम । मिलिग साह हुसैन ॥ आदर नृप किन्नौ अदब । विवच प्रसंनिय वैनं ॥ छं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ २१ ॥ हुसैन को दक्षिण की ओर नागौर की जागीर देना । दूहा ॥ लिये सथ्य पृथिराज पहुं । गयौ सुपुर नागौर ॥ धरमायन कारथ†धवल । दिसि दच्छिन दिय ठौर ॥ छं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २२ ॥ पृथ्वीराज का हुसैन को घोड़े हाथी आदि देना और दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ना ॥ दूहा ॥ भोजन भष्ये विविध वर, बहु आदर विधि कीन । मान सचातम रखि रज, राज उभय हय दीन ॥ छं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २३ ॥ दूहा ॥ धरिय डोरि हुस्सेन सिर, है बंधिय चैसाल । २० पाठान्तर-देन । धंनि धंनि । धंम । सों ॥

  • यह रूपक हमारी सं० १६४७ वाली प्राचीन पुस्तक में नहीं है पर आधुनिक पुस्तकों में है ॥ २१ पाठान्तर-नृप । प्रसंनीय ॥ २२ पाठान्तर-सथ । प्रथीराज । पहुं । धूंमाइन कायथ । दछिन । दषन । दै ॥ † धर्मोयन कायथ = पृथ्वीराज का दरबार मुंशी था । उसका काम है कि जो जो दरबार में आवें उनको उनकी नियत की हुई ठौर पर बैठावे । ऐसा बरताव अभी तक राजपुताने में प्रचलित है ॥ २३ पाठान्तर-भष । मांन । रखि ॥ उभै ॥