पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १० भंजौं सुनै नागौर ढेस । जीवंत बंदि बंधौं नरेस ॥ सामंत सूर सब करौं अंत । बंधौ सुबंध सा तहनि कंत ॥ छं० ॥ ३६ ॥ उच्चरि गुमान तन बत्त सूल । संक्षेप कहै मानौं स धूल ॥ तुम जाउ सिघ्र नागौर बाम । मति करौ एक छिन घर विश्राम ॥ ३७ ॥ तीन सौ सवार और रथ देकर अरब ख़ां को रवाना करना ॥ सै तीन दीन असवार सथ्थ । आरुढन दीन नरयान रस्थ ॥ एक महिने में अरब ख़ां का नागौर पहुंचना ॥ संच्यो शेष आरब्ब राह । दो पख पत्त नागौर थ्राह ॥ छं० ॥ ३८ ॥ रु० ॥ २८ ॥ अरब ख़ां का हुसैन से मिलकर समझाना, हुसैन का न मानना ॥ दूहा ॥ गय आरब नागौर धर । मिल्यौ साह हूसेन ॥ भोजन भष्प सुभाव किय । विविध प्रसन्नीय बैन ॥ छं० ॥ ३९ ॥ रु० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ कही बत्त हूसेन सम । जो कहि साच सहाब ॥ नह मंनिय सोमंत दिय । दिय आरब्ब जबाब ॥ छं० ॥ ४० ॥ रु० ॥ ३१ ॥ अरब ख़ां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ दूहा ॥ गयो शेष आरब्ब दर । लही षवर प्रथ्रिराज ॥ बोलि मक्तू संडिय सज्ज । सामंतन सब साज ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ ३२ ॥ पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ दूहा ॥ मंझ सल्ल आरब्ब गय । मिंल्ल मंनिय सनमान ॥ दै आसन पुच्छिय कुसल । चाहुआन सुलतान ॥ छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥ ३० पाठान्तर-हुसैन । भप । बिबह । प्रसंचे । बैन ॥ ३१ पाठान्तर-हुसेन । साहाब । नंह । आरब ॥ ३२ पाठान्तर-आरब । पबरि । पृथीराज । मक्ल । सांमंतां । सम राज ॥ ३३ पाठान्तर-आरख । सनमांन । पुछिय । कुशल । चाहुवांन । सुरतान ॥